वर्चुअल ऑटोप्सी तकनीक से शव में घावों की संख्या, गहराई, लंबाई-चौड़ाई का आसानी से पता लगाया जा सकेगा। मृतक को कितनी गोलियां लगीं और कहां-कहां लगीं, इसका पता लगाने के साथ उन्हें निकालना भी आसान होगा। जहर से मौत के मामले में उसी हिस्से को निकाला जाएगा जहां इसके प्रमाण मिलेंगे, इससे पूरे शव का चीर फाड़ नहीं किया जाएगा और समय भी बचेगा।
वर्चुअल ऑटोप्सी से शव की चीरफाड़ रुक जाएगी। जहां गोली होगी, देखा जा सकेगा और वहीं से निकाला जा सकेगा। इसके अलावा जहर के मामले में प्रभावित अंग को देखा जा सकेगा और उसी को जांच के लिए लिया जाएगा, इससे पूरे शरीर पर चीरा नहीं लगाना पड़ेगा। हमारे यहां दो तल का भवन तैयार है। अंदर की फिनिशिंग का कार्य चल रहा है। इसमें पांच टेबल होंगी और यहां पुलिस, डॉक्टर, स्टाफ व आमजन के लिए वेटिंग हॉल भी होगा। यह क्षेत्र बदबूरहित होगा। यहां अब नेशनल डिजास्टर मैनेजमेंट के तहत 80 शव रखने की क्षमता होगी, इसके अलावा शव रखने के लिए चार-चार चैंबर भी होंगे। -डॉ. एसके धत्तरवाल, विभागाध्यक्ष, फोरेंसिक मेडिसिन, पीजीआईएमएस रोहतक।