जाट आरक्षण आंदोलन हिंसा को लेकर सरकार को अदालत में एक बार फिर झटका लगा। बुधवार को एएसजे रजनी यादव की अदालत ने सांपला की पंचायत में जातिगत भड़काऊ भाषण देने के मामले में दायर अपील खारिज कर दी। सरकार की ओर से निचली अदालत के फैसले के खिलाफ अपील दायर की गई थी।
पुलिस रिकाॅर्ड के मुताबिक, सुरक्षा एजेंट के तौर पर तैनात सिपाही योगेंद्र ने सांपला थाने में 29 फरवरी को शिकायत दी थी कि 14 फरवरी 2016 को जाट आरक्षण को लेकर सांपला के पूर्व बाईपास चौक पर लोगों ने हाईवे को जाम किया था। अगले दिन एडवोकेट मनोज दूहन निवासी जसिया जाम लगाकर बैठे लोगों के बीच आकर भाषण देने लगा। आरोप था कि जातिगत भड़ाकाऊ भाषण दिया। पुलिस ने आरोपी के खिलाफ 153ए, 153 व 188 के तहत मामला दर्ज किया था।
बचाव पक्ष के वकील जितेंद्र हुड्डा ने बताया कि तीन साल चले केस के बाद 2019 में निचली अदालत ने एडवोकेट मनोज दूहन को बरी कर दिया, क्योंकि इस तरह के केस चलाने के लिए सरकार से अनुमति लेनी होती है। इस केस में अनुमति नहीं ली गई। सरकार ने केस में सेशन कोर्ट में अपील दायर करने का निर्णय लिया। 2019 से अब तक केस की सेशन कोर्ट में सुनवाई चली।
ये कमियां रहीं केस में, साबित नहीं हो सके आरोप
बचाव पक्ष के वकील ने बताया कि आईपीसी की धारा 153ए, 188 व 505 के तहत दर्ज केस में सरकार से केस चलाने की अनुमति लेनी होती है। इसमें अनुमति नहीं ली गई। दूसरा, जांच अधिकारी एसआई सतबीर को बताया गया, जबकि थाने के रिकाॅर्ड में उस समय ड्यूटी एसआई होशियार सिंह की थी। तीसरा, यह नहीं बताया गया कि अदालत में दी गई सीडी किसने बनाई। सीडी को किसने प्रमाणित किया। कानून के तहत ऐसा होना अनिवार्य होता है। इस तरह आरोपों को अदालत में साबित नहीं किया जा सका था। चौथा, घटना 14 फरवरी 2016 की बताई गई, जबकि एफआईआर 29 फरवरी को दर्ज की गई।