रोहतक। रुड़की स्थित शहीद बैतून सिंह स्टेडियम मुक्केबाजों का गढ़ बन गया है। स्टेडियम में हरियाणा ही नहीं देश के सात राज्यों की बेटियां मुक्केबाजी सीख रही हैं। यहां उत्तर प्रदेश, पंजाब, बिहार, राजस्थान, हिमाचल प्रदेश, महाराष्ट्र, असम की मुक्केबाज हुनर निखार रही हैं।
वर्ष 2012 में आठ मुक्केबाजों के साथ शुरू हुआ यह स्टेडियम अब 80 से अधिक मुक्केबाजों को बॉक्सिंग के गुर सिखा रहा है। यह स्टेडियम देश को 11 अंतरराष्ट्रीय मुक्केबाज दे चुका है।
कोच विजय हुड्डा ने बताया कि उन्होंने 12 वर्षों से बिना किसी शुल्क के इन मुक्केबाजों को प्रशिक्षित किया है। शुरुआत में एक साधारण बॉक्सिंग रिंग के अलावा यहां कोई सुविधा नहीं थी लेकिन आज यहां अंतरराष्ट्रीय स्तर की सुविधाएं उपलब्ध हैं। संवाद
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2026 के एशियन गेम्स व राष्ट्रमंडल खेलों की तैयारी शुरू
जिले के रिठाल गांव की शिक्षा नरवाल ने बताया कि 2012 में मैरीकॉम को ओलंपिक में कांस्य पदक जीतते देख उन्होंने भी मुक्केबाज बनने का फैसला किया। परिवार ने एक बार तो विरोध किया लेकिन फिर सहयोग किया। गांव में बॉक्सिंग का कोई माहौल न होने के कारण उन्हें पास के गांव में शहीद बैतून सिंह स्टेडियम में जाकर अभ्यास करना पड़ता था। 2018 एशियन गेम्स में कांस्य पदक व 2020 साउथ एशियन गेम्स में रजत पदक जीता। 2021, 2022 व 2023 में लगातार सीनियर नेशनल चैंपियनशिप जीती। अब 2026 में होने वाले एशियन गेम्स व राष्ट्रमंडल खेलों की तैयारी कर रही हूं।
मैरी कॉम से प्रेरित होकर खेलना शुरू किया
रुड़की की बॉक्सर बेटी मोनिका ने बताया जब खेलना शुरू किया, उस समय परिवार ने सपोर्ट किया, मां सुनीता ने सबसे ज्यादा सपोर्ट किया था लेकिन पिता को चिंता थी कि लड़की बाहर खेलने जाएगी। लोग बोलते थे कि लड़की को बाहर नहीं भेजना चाहिए। समय अच्छा नहीं है कुछ हो गया तो। बाहर का माहौल अच्छा नहीं है। लड़की के लिए पढ़ना-लिखना ही ठीक है। शुरू में वैसे खेलने जाते थे तो कोच विजय हुड्डा जो बच्चे खेलने आते थे तो उन्हें डाइट दे देते थे। फिर 2012 में अच्छे से खेलना शुरू किया। 2012 में बॉक्सर मैरीकॉम का भी मेडल आया था तो उनसे प्रेरणा मिली। उसके जब मेडल आने शुरू हो गए, लोग बोले-महारी छोरी गांव का नाम रोशन करेगी।
बॉक्सिंग से प्रेरित होकर खेलना शुरू किया
बॉक्सर ज्योति ने बताया कि अब 2026 में होने वाले एशियन गेम्स और कॉमनवेल्थ गेम्स की तैयारी कर रही हूं। ज्योति के पिता मामन सिंह किसान हैं, मां गृहिणी हैं और भाई प्रवीन खेती करते हैं। परिवार की आर्थिक स्थिति शुरू से ही बहुत अच्छी नहीं थी। बचपन में ज्योति गांव के स्टेडियम में बस ऐसे ही खेलने या घूमने जाती थी। एक दिन उसने वहां बॉक्सिंग की एक प्रतियोगिता देखी। खिलाड़ियों को शानदार प्रदर्शन करते, पदक जीतते और फिर स्कूल में सम्मानित होते देख उसके मन में भी एक सपना जागा। उसने तभी सोच लिया कि वह भी बॉक्सिंग खेलेगी। इसके बाद वर्ष 2012 में खेलना शुरू किया।
40...शहीद बैतूल सिंह स्टेडियम रुड़की में कोच विजय के साथ मौजूद खिलाड़ी। स्रोत : कोच- फोटो : संवाद