रोमन दार्शनिक सिसरो ने करीब दो हजार वर्ष पूर्व कहा था कि इतिहास की उपेक्षा करने वाले लोग नियति के हाथों सख्त दंड पाए बिना नहीं रह सकते। क्योंकि, वर्तमान और भविष्य, भूतकाल की नींव पर टिका होता है।
नींव को ही नजर अंदाज कर देंगे तो महल कितना ही सुंदर दिखे पर उसका अस्तित्व हमेशा खतरे में रहेगा। रेवाड़ी के गांव नाहड़ में 11 अक्तूबर 1936 को जन्मे जाने-माने इतिहासकार डॉ. केसी यादव ने इसी विचार से प्रेरित होकर हरियाणा के बिखरे इतिहास को संजोया।
शोधार्थी जीवन में डॉ. यादव ने पाया कि 1857 की क्रांति, स्वतंत्रता आंदोलन, से लेकर आजाद हिंद फौज तक में भर्ती होकर हरियाणा के युवाओं ने गोरी सरकार के विरुद्ध खूब लोहा लिया लेकिन दस्तावेजों में इसका कहीं कोई उल्लेख नहीं है।
राजस्थान में कई शोध केंद्र व शोध पत्रिकाएं देखकर डॉ. यादव ने 1965 में रेवाड़ी में हरियाणा शोध संस्थान की नींव रखी और पहला द्विभाषी हरियाणा रिसर्च जनरल शुरू किया।
अगले वर्ष पंजाब से अलग होकर हरियाणा प्रांत गठित हुआ तो डॉ. यादव के काम देखकर कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. डीसी वर्मा ने उन्हें अध्यापन का ऑफर भेजा।
यूनिवर्सिटी चले जाने पर कुरुक्षेत्र से जनरल ऑफ हरियाणा स्टडीज नाम से दूसरी शोध पत्रिका शुरू की। इसका 30 वर्षों तक संपादक करते हुए सूबे के इतिहास, संस्कृति एवं भाषा से जुड़ी बहुमूल्य सामग्री छापी। यूनिवर्सिटी से सेवानिवृत्ति के बाद 2006 में हरियाणा इतिहास, संस्कृति एवं सामाजिक विकास केंद्र की गुड़गांव में स्थापना की।
यही केंद्र 2010 में हरियाणा इतिहास एवं संस्कृति अकादमी में परिवर्तित हो गया। डॉ. यादव इसके संस्थापक अध्यक्ष बने और इतिहास और संस्कृति पर वैज्ञानिक दृष्टिकोण वाले शोध, सेमिनार, प्रदर्शनी, प्रामाणिक साहित्य को प्रोत्साहन और शोध पत्र-पत्रिकाओं को जन-जन तक पहुंचाया।
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डॉ. एसबी चौधरी, अकादमी के शोधार्थी रहे लेखक चौधरी रणवीर सिंह संग्रहालय के कर्ता-धर्ता हैं।
इनसेट...
विभूतियों पर लिखीं तीन दर्जन किताबें
डॉ. यादव ने भारत के विभूतियों पर लगभग तीन दर्जन पुस्तकें लिखी हैं। इनमें सर छोटूराम, मुरलीधर, स्वामी दयानंद सरस्वती, अहलावत का इतिहास, 1857 में हरियाणा की भूमिका, चौधरी मातूराम, पंडित भीराम शर्मा, भगत सिंह, सुभाष चंद्र बोस आदि शामिल हैं।