दयानंद मठ विवाद कोर्ट की तारीखों में उलझकर रह गया है। मंगलवार को एसडीएम कोर्ट में फैसला आने की संभावना थी, लेकिन कोर्ट ने मठ कार्यालय में लगी धारा-145 को सही करार दिया।
हालांकि कोर्ट ने दोनों पक्षों को 24 अप्रैल को दोबारा बुलाया है। फैसले से आर्य समाज का एक गुट काफी नाराज है। उन्होंने हाईकोर्ट के आदेशों की अवहेलना करने का आरोप लगाते हुए दोबारा से कोर्ट में जाने की बात कही है। बुधवार को एक अन्य मामले में दोनों पक्षों को सोसायटी रजिस्ट्रार के समक्ष भी पेश होना है।
18 अप्रैल को एसडीएम ने आर्य समाज के दोनों गुटों के पक्ष को सुनने के बाद मंगलवार को फैसला सुनाने की बात कही थी। दोनों ही पक्ष मंगलवार को पूरे जोश के साथ एसडीएम कोर्ट पहुंचे। लेकिन एसडीएम ने मठ कार्यालय पर लगी धारा-145 को सही करार दिया। समाज के लोगों ने हाईकोर्ट के फैसले का हवाला दिया तो एसडीएम ने कहा कि फिलहाल परिस्थिति धारा हटाने की नहीं है।
उन्होंने दोनों पक्षों को 24 अप्रैल को दोबारा से बुलाया है। दूसरी तरफ आचार्य वेदप्रकाश गुट का कहना है कि जब हाईकोर्ट ने धारा-145 हटाने के आदेश जारी कर दिए हैं तो फिर एसडीएम इन आदेशों की पालना क्यों नहीं कर रहे हैं? 24 तारीख तक वे इंतजार करेंगे। यदि फिर भी मामले को उलझाने की कोशिश की तो वे दोबारा से हाईकोर्ट जाएंगे। जबकि आचार्य विजयपाल गुट का कहना है कि कोर्ट का फैसला उनके लिए अंतिम है। कोर्ट का हर फैसला मान्य होगा।
आर्य समाज के लोगों ने दो कार्यकारिणी बना रखी हैं। दोनों ही कार्यकारिणी पदाधिकारी मठ पर अपना अधिकारी होने का दावा भी कर रहे हैं। कार्यकारिणी की वैधता को लेकर सोसायटी रजिस्ट्रार की अदालत में यह केस चल रहा है। बुधवार को मामले की सुनवाई होनी है।
दयानंद मठ को लेकर सियासत चरम पर है। जानकारों की मानें तो मठ की साढ़े आठ एकड़ जमीन पर कब्जा पाने के लिए यह सारी कवायद हो रही है। जिला प्रशासन के अलावा प्रदेश सरकार भी इस विवादी मकड़जाल में उलझकर रह गई है।
आर्य प्रतिनिधि सभा हरयाणा और आर्य निर्मात्री सभा सदस्यों का दावा है कि दयानंद मठ पर उनका मालिकाना हक है। दोनों ही गुट रजिस्ट्रर्ड हैं और चुनाव जीतकर अपनी कार्यकारिणी का गठन कर चुके हैं। समाज भी दो हिस्सों में बंटा हुआ है और अपने गुट के समर्थन में खड़ा है।
पंडित जगदेव सिंह सिद्धांती भवन दयानंद मठ 1975 में स्वतंत्र रूप से अस्तित्व में आया। इससे पहले यह आचार्य प्रतिनिधि सभा पंजाब का उप कार्यालय था। साढ़े आठ एकड़ जमीन में अलग-अलग तीन भवन हैं। एक भवन में सिद्धांती भवन है। जहां दयानंद मठ का मुख्य कार्यालय था। दूसरे भवन में चौधरी लखीराम अनाथालय और तीसरे भाग में दयानंद मठ की पुरानी इमारत है।
दयानंद मठ के आसपास के इलाके के लोगों ने दयानंद मठ प्रबंध कार्यकारिणी सभा का गठन कर लिया। सभा ने कोर्ट में याचिका दायर कर दी। याचिका में सभा पदाधिकारियों ने मठ की जमीन पर मालिकाना हक जताया। 20 मई 2011 में कोर्ट ने इस याचिका को खारिज कर याचिकाकर्र्ताओं पर जुर्माना भी लगाया। इसके बाद तो मठ पूरी तरह से विवादों में रहने लगा। आर्य समाज के लोग दो गुटों में बंट गए।
26 दिसंबर 2013 में सभा का चुनाव हुआ। जिसमें आचार्य विजयपाल को प्रधान, यशपाल आचार्य को उप प्रधान, मास्टर रामपाल आर्य को मंत्री, ओम कुमार आर्य को उप मंत्री, कन्हैयालाल को कोषाध्यक्ष और आजाद सिंह आर्य को पुस्तकालयाध्यक्ष चुना गया। इसके अलावा 15 सदस्यों को कार्यकारिणी सदस्य भी बनाया गया। धर्मपाल आर्य इस चुनाव के अधिकारी थे।
फर्म एंड सोसायटी रजिस्ट्रार को लिखे पत्र के माध्यम से वेदप्रकाश आर्य ने सूचना दी कि आचार्य विजयपाल की सभा को भंग कर दिया गया है। इसके चलते एक जुलाई 2013 को डॉ. महाबीर सिंह दहिया के नेतृत्व में एक तदर्थ कमेटी का गठन किया गया। 12 दिसंबर 2013 को सर्वसम्मति से नई कार्यकारिणी का गठन किया गया। चुनाव अधिकारी रणजीत आर्य की उपस्थिति में यह कार्यकारिणी गठित की गई।
जिसमें 200 प्रतिनिधियों को चुना गया। सर्वसम्मति से अनिल आर्या को प्रधान, डॉ. सुनीति आचार्या उपप्रधान, मास्टर वेदप्रकाश आर्य को मंत्री, आचार्य वर्चस्पति को उपमंत्री, राजरानी को कोषाध्यक्ष और राकेश आर्य को पुस्तकालयाध्यक्ष चुना गया।
दोनों गुट मठ पर अपनी-अपनी कार्यकारिणी का हक बता रहे थे। जिसे लेकर कई बार झगड़ा भी हो चुका था। दोनों गुटों का विवाद जिला प्रशासन के लिए सिरदर्द बनता गया। एक गुट के मठ में घुस जाने और हंगामे के बाद 24 दिसंबर 2014 को मठ के सिद्धांती भवन पर प्रशासन की ओर से धारा-145 लगा दी गई। इस धारा के मुताबिक प्रशासनिक भवन पर आर्य समाज के किसी भी गुट के कब्जे के बजाए जिला प्रशासन का कब्जा रहेगा।
हालांकि बाद में दोनों पक्षों ने प्रशासन के फैसले को हाईकोर्ट में चुनौती दी। हाईकोर्ट ने भवन पर धारा-145 का लगाना गलत तो करार दिया था, लेकिन अंतिम फैसला लोकल कोर्ट (एसडीएम) पर ही छोड़ा था। मुख्य कार्यालय इस भवन में होने के कारण सभा सदस्यों के लिए कोई जगह नहीं बची। ऐसे में चार मार्च को उन्होंने पुराने भवन में अपना कार्यालय बना लिया।
13 मार्च को सभा सदस्य और विजयपाल आर्य गुट धारा 145 हटवाने के लिए डीसी को ज्ञापन देने जा रहे थे। लेकिन धारा 144 लगी होने के कारण पुलिस ने समाज के लोगों को सामान्य अस्पताल के पास ही रोक लिया। देखते ही देखते विवाद बढ़ गया। जिस कारण पुलिस को लाठीचार्ज करना पड़ा।
पुलिस ने भीड़ को तितर-बितर करने के लिए समाज के लोगों पर आंसू गैस के गोले और पानी की बौछारें की। पुलिस उन्हें खदेड़ते हुए मठ तक ले गई।