संवाद न्यूज एजेंसी
रोहतक। वर्तमान में प्लास्टिक पर्यावरण और जीवों के लिए काल बन चुका है। उत्तर भारत में हर साल धान की पराली को खेतों में जलाना बड़ी समस्या बनी हुई है। इन समस्याओं के हल के लिए एमडीयू के पर्यावरण विभाग की छात्रा डॉ. शिखा कुमारी ने शोध में पराली व आलू के छिलकों से ऐसा बायोप्लास्टिक तैयार किया है जो 60 दिन में गल सकती है। इससे प्लास्टिक के बैग के साथ कटोरे या बर्तन भी तैयार किए जा सकते हैं।
प्लास्टिक व पराली प्रबंधन के लिए धान की पराली से सेल्यूलोज व आलू के छिलकों से प्राप्त स्टार्च के मिश्रण का उपयोग कर खास बायोप्लास्टिक तैयार किया गया है। इस प्रक्रिया में सोर्बिटोल व ग्लिसरॉल जैसे पर्यावरण अनुकूल प्लास्टिसाइजर का इस्तेमाल किया गया है। यह पूरी तरह सुरक्षित है।
शोध के दौरान तैयार की गई बायोप्लास्टिक शीट के गुण बाजार में मिलने वाले कॉमर्शियल कंपोस्टेबल कैरी बैग के बराबर हैं। सबसे बड़ी बात यह है कि जहां आम प्लास्टिक सैकड़ों सालों तक नष्ट नहीं होता, वहीं यह बायोप्लास्टिक शीट मिट्टी में महज 60 दिन के भीतर पूरी तरह गल जाती है।
जेब पर भी नहीं पड़ेगा बोझ, लागत बेहद कम
इसकी एक विशेषता आर्थिक तौर पर सस्ती होना है। प्रति बायोप्लास्टिक शीट पर 4.6 से 5.2 रुपये और बायोप्लास्टिक बाउल (कटोरा) पर 6.6 से 7.2 रुपये लागत आई है।
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प्रयोगशाला से उद्योगों तक पहुंचने की जरूरत
विभाग की एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. गीता ने बताया कि इस शोध को लैब तक सीमित न रखकर उद्यमियों के सहयोग से बाजार में उतारकर प्लास्टिक की समस्या से निजात पाई जा सकती है। वहीं, किसानों को पराली जलाने से भी निजात मिल सकेगी।
06-डॉ. गीता
06-डॉ. गीता