रोहतक। शिक्षा का उजियारा हर अंधेरे को समाप्त कर सकता है। बेटियों के जन्म लेने में अग्रणी जिले का लाढ़ौत गांव कुछ यही दर्शा रहा है। गांव की 90 प्रतिशत आबादी का शिक्षित होना व गर्भपात नहीं कराने का दावा बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ अभियान को सार्थक करता नजर आ रहा है। स्वास्थ्य विभाग भी इस उपलब्धि के लिए गांव को सम्मानित करेगा। इससे विपरीत कुताना और शिमली गांव में एक हजार बेटों पर 650 से भी कम बेटियां जन्मी हैं।
सामाजिक ताना-बाना बनाए रखने व समाज में संतुलन बनाए रखने के लिए लिंगानुपात (बेटों व बेटियों की प्रति हजार पर संख्या) अहम है। इसमें बड़ा अंतर समाज के लिए घातक हो सकता है। यही वजह है कि सरकार व स्वास्थ्य विभाग बेटों व बेटियों की संख्या समान बनाए रखने पर जोर दे रहा है।
इसी कड़ी में लोगों को जागरूक करने के लिए विभिन्न गतिविधियों का आयोजन किया जाता है। साथ ही, गर्भपात या भ्रूण लिंग जांच पर प्रतिबंध लगाया गया है। ऐसा करने वालों के खिलाफ कार्रवाई की जाती है। पिछले छह माह में स्वास्थ्य विभाग ने छापे मार कर छह से ज्यादा केस दर्ज कराने के साथ दस से ज्यादा लोगों को भी पकड़ा है।
5000 की आबादी में 3000 वोट
ग्राम सरपंच ने बताया कि लाढौत करीब पांच हजार की आबादी का गांव है। यहां करीब तीन हजार वोट हैं। इसके अलावा 30 प्रतिशत पांच वर्ष से कम व 30 प्रतिशत पांच से 18 वर्ष तक के बच्चे हैं। गांव में शिक्षा के लिए तीन स्कूल है। इनमें से एक वरिष्ठ माध्यमिक व दो उच्च विद्यालय हैं। गांव में बिजली पानी की भी बेहतर सुविधा उपलब्ध है।
कुताना और शिमली गांव कम जन्मीं बेटियां, विभाग के लिए चुनौती
जिले में कुताना व शिमली गांव में बेटियों की जन्म दर सबसे कम है। यह 650 से कम है। स्वास्थ्य विभाग के आंकड़ों पर नजर डालें तो कुताना में एक हजार बेटों के पीछे महज 628 बेटियां हैं, जबकि शिमली में यह आंकड़ा 631 है। यह जिले में सबसे कम है।
ऐसे में यहां का अनुपात सुधारना स्वास्थ्य विभाग की बड़ी चुनौती है। इसी कड़ी में विभाग ने डिप्टी सिविल सर्जन की ड्यूटी ऐसे गांवों में लगाई है। यहां ये अधिकारी जागरूकता अभियान चलाने के साथ गर्भपात कराने वालों पर नजर रखेंगे। बेटियों को सुरक्षित रखने की दिशा में काम करने के साथ उन्हें प्रोत्साहित व सम्मानित भी किया जाएगा।
वर्जन
जिले में प्रति हजार बेटों के मुकाबले जन्म लेने वाली बेटियों की संख्या में सुधार आया है। कुछ गांव 1200 से अधिक लिंगानुपात वाले हैं। ये दूसरों के लिए मिसाल हैं। इन गांवों को सम्मानित किया जाएगा। कुछ गांव 700 से कम लिंगानुपात वाले हैं। यहां काम करने की जरूरत है। इस ओर विशेष ध्यान दिया जा रहा है। इसी कड़ी में डिप्टी सिविल सर्जन की ऐसे गांवों में जिम्मेदारी लगाई गई है।
- डाॅ. रमेश चंद्र, सिविल सर्जन।