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विपरीत परिस्थितियों से उबर कर पंच की पावर से सोना जुटा रही महिला बॉक्सर बनी सशक्तिकरण का पर्याय

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विपरीत परिस्थितियों से उबर कर पंच की पावर से सोना जुटा रही महिला बॉक्सर बनी सशक्तिकरण का पर्याय
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- नेशनल वुमेन बॉक्सिंग चैंपियनशिप में देश के विभिन्न प्रांतों से आई महिला बॉक्सर दे रही बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ का संदेश
विकास सैनी
रोहतक
लंबा घूंघट। धीमी आवाज में बात करना। घर की चारदीवारी में रहना और चूल्हा चौका करना। अब बस, और नहीं। दूसरी एलाइट नेशनल महिला बॉक्सिंग चैंपियनशिप में देश भर से अपने पंच का दमखम दिखाने आई बेटियां कुछ यहीं कह रही हैं। अनेक मुश्किलें सह कर भी आगे बढ़ने से हार नहीं मानने वाली बॉक्सर बेटियों के संघर्ष की कहानी भी आधी आबादी को सिर उठा कर जीने का संदेश दे रही हैं। आइए आपको भी इनसे रूबरू कराएं।
पहली कहानी :
डाइट पूरी करने को रोजाना 20 किलोमीटर साइकिल चलाई, ऑटो का किराया बचाकर जूस के लिए जुटाए रुपये
भिवानी के दनोद की कलावंती बॉक्सर हैं। यह 19 वर्षीय बॉक्सर स्नातक तृतीय वर्ष की छात्रा है। ऑल इंडिया इंटर यूनिवर्सिटी चैंपियनशिप में दो बार गोल्ड व एक बार सिल्वर मेडल जीतने वाली यह खिलाड़ी स्कूली राष्ट्रीय खेलों में भी तीन साल लगातार गोल्ड मेडल जीत चुकी है। यूथ नेशनल में भी एक गोल्ड मेडल हासिल किया है। अब कॉमनवेल्थ पर निशाना है। राजीव गांधी खेल परिसर में नेशनल टीम में जगह बनाने के लिए नेशनल वुमेन बॉक्सिंग चैंपियनशिप में पहुंची इस खिलाड़ी का यहां तक का सफर बेहद कठिन रहा है।
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कलावंती ने बताया कि मुझे अपनी मां का सपना पूरा करना है। वह चाहती थी, तेरे पर भरोसा है। चैंपियन बनकर देश का नाम रोशन करेगी। दो साल पहले वे चल बसी। इससे पहले हर पल मां ने मेरा हौसला बढ़ाया। मां बंटाई पर खेती करती थी। हम भाई बहन भी उनका हाथ बंटाते थे। स्कूली खेलों में हिस्सा लेने के साथ ही खेल की दुनिया का सफर शुरू हुआ। सेवानिवृत्त फौजी ताऊ कृष्ण ने बॉक्सिंग खेलने के लिए प्रेरित किया। उन्होंने आर्थिक रूप से भी मदद की। कोच जगदीश ने खेल के दांवपेंच के साथ परिस्थितियों से उबरना सिखाया। उस समय मैं 11वीं में पढ़ती थी। परिवार आर्थिक रूप से कमजोर था। इसलिए डाइट पूरी नहीं मिलती थी। गांव से स्टेडियम करीब दस किलोमीटर दूर था। इसलिए आने जाने के लिए घर से ऑटो का किराया मिलता था। इसे बचाने के लिए साइकिल से जाती थी। डाइट की कमी पूरी करने के लिए किराए के बचाये रुपये से जूस पीया। कम डाइट के बाद भी लगातार खेलती रही। इस दौरान चोटें भी लगी। इस दौरान कोच, साथी खिलाड़ी व परिवार का सहयोग मिला।

दूसरी कहानी :
मीना ने भूखे रह कर भी खेलना पड़ा, राष्ट्रीय व अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर जीता सोना
एम मीना कुमारी देवी मणिपुर के गांव सुगनु की रहने वाली है। सीआईएसएफ की हेड कांस्टेबल अब ऑल इंडिया पुलिस की ओर से नेशनल वुमेन बॉक्सिंग चैंपियनशिप में खेलने आई है। पिछले 15 वर्षों से बॉक्सिंग खेल रही इस 12वीं पास खिलाड़ी ने भूखे रहकर भी प्रेक्टिस करते हुए मेडल जीते। अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर एक गोल्ड समेत कुल पांच, राष्ट्रीय स्तर पर एक गोल्ड मेडल के साथ बेस्ट प्रमोसिंग बॉक्सर सम्मान के अलावा एक सिल्वर व पांच ब्रांज मेडल जीत चुकी है।
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मीना ने बताया कि इसका लक्ष्य ओलंपिक में स्वर्ण पदक जीतना है। इसके लिए पहली कड़ी टक्कर 12 जनवरी को होगी। इसमें जीतने वाला ही इंडियन टीम के कैंप में जाएगा। साधारण किसान परिवार से संबंध रखती है। वह चार भाई बहनों में दूसरे नंबर पर है। परिवार की माली हालत कमजोर होने के कारण कई बार भूखे रह कर भी अभ्यास करना पड़ा। डाइट पूरी नहीं मिलने की कभी चिंता नहीं की। इसके बावजूद कुछ नहीं मिला तो परिवार ने कई बार खेल छोड़ देने के लिए कहा, मगर लगातार खेलती रही। बॉक्सर दीदी सरिता ने हर कदम पर मदद की। समझाया, प्रोत्साहित किया तो यहां पहुंच पाई। सीआईएसएफ में दो साल पहले नौकरी मिली तो कुछ राहत मिली। इससे डाइट के साथ परिवार के लिए खर्च मिल जाता है। अब ओलंपिक में देश के लिए मेडल जीतना है।
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