रोहतक। जिले की जमीन में 226 जगह इतिहास दफन है। यह हम नहीं कह रहे, बल्कि पुरातत्वविदों की टीम ने जिले में किए गए शोध में यह खुलासा किया है। इन स्थलों में इतिहास से जुड़ी घाघर-हाकड़ा संस्कृति से लेकर मध्यकाल तक की कई ऐसी अहम चीजें मिली हैं, जो प्रमाणित करतीं हैं कि ऐतिहासिक दृष्टि से रोहतक कितना महत्व है।
दरअसल, भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण से अनुमति मिलने के बाद जाट कॉलेज के इतिहासकार डॉ. विवेक दांगी और एमडीयू के पूर्व प्रोफेसर डॉ. मनमोहन सिंह ने टीम के साथ जिले की ऐतिहासिक वास्तु स्थिति जानने के लिए शोध शुरू था। शोध के माध्यम से जिले के विभिन्न गांवों जाकर बुजुर्गों से बातचीत की गई और खेतों-जंगलों में जाकर वहां की पुरातात्विक स्थिति देखी। इसमें जो खुलासा हुआ उससे पुरातत्वविद भी अचंभित रह गए।
अभी तक जिले में ऐतिहासिक दृष्टि से 109 पुरास्थल ज्ञात थे। शोध में 117 और ऐसे मिले जो पांच से सात हजार साल पहले की घाघर-हाकड़ा संस्कृति से लेकर मध्यकाल ई. के अवशेषों के बारे में जानकारी देते हैं। पुरातत्वविदों ने अध्ययन किया कि किस संस्कृति के कितने पुरास्थल हैं। उसमें भी मध्यकाल के कई महत्वपूर्ण तथ्य सामने आए हैं। इस शोध से इतना तो स्पष्ट है कि पुरानी संस्कृति का यहां से काफी जुड़ाव रहा है।
कई स्थलों पर हो चुका है उत्खनन
इससे पहले कई गांवों में उत्खनन भी कराया जा चुका है। इसमें गिरावड़, फरमाणा, गंगानगर, मदीना, खोखराकोट और अस्थल बोहर माजरा मुख्य स्थान माने गए हैं। उत्खनन से यह ज्ञात हुआ कि रोहतक में मनुष्य का स्थायी जीवन करीब छह हजार साल पहले शुरू हुआ था। फिलहाल आसन, गांधरा, भाली आनंदपुर, अटायल, सैमण और मोखरा के 117 पुरास्थलों का शोध किया गया है।
1500 साल पुराना है किलोई मंदिर का शिवलिंग
शोध में यह भी सामने आया कि किलोई गांव के शिव मंदिर का शिवलिंग गुप्त काल का है। यानी कि करीब 1500 साल पहले का शिवलिंग है। पुरातत्वविदों की खोजबीन में कई महत्वपूर्ण तथ्य सामने आए हैं।
ऐसे की गई संस्कृति की पहचान
डॉ. विवेक दांगी के अनुसार, इन पुरास्थलों पर सदियों पुरानी संस्कृति की पहचान करना आसान नहीं था। शोध के दौरान पुरास्थलों पर मिट्टी के बर्तन या कुछ ऐसी वस्तुएं पाई गईं, जिससे प्रमाणित होता है कि यहां पर किस संस्कृति के लोग रहते थे।