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घोषणा के छह माह बाद भी बच्चों को नहीं मिल रहा दूध

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घोषणा के छह माह बाद भी बच्चों को नहीं मिल रहा दूध
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चरखी दादरी।
राजकीय स्कूलों के मिड-डे-मिल इंचार्ज आए दिन विभाग अधिकारियों को फोन कर दूध व बजट राशि बढ़ाने की मांग कर रहे हैं। फिर भी राजकीय स्कूलों से प्राइमरी स्कूल के बच्चों की संख्या भेजने के तीन माह बाद भी मिड-डे-मील में बच्चों को दूध नहीं मिल पा रहा है। जुलाई माह में हर साल बढ़ने वाले सात प्रतिशत प्रति बालक बजट को भी नहीं बढ़ाया है। ऐसे में स्कूलों में मिड-डे-मील इंचार्ज की लगातार चिंता बढ़ रही है। मिड-डे-मील में दूध न होने से बच्चों को सभी आवश्यक पोषक तत्व नहीं मिल पा रहा है और उन्हें चार दिन चावल और दो दिन गेहूं से बने व्यंजन खिलाए जा रहे हैं। डब्ल्यूएचओ के आंकड़ों के अनुसार आज देश का हर तीसरा बालक कुपोषण का शिकार है। इस समय मिड-डे-मील इंचार्ज आए दिन विभाग अधिकारियों को फोन कर बजट बढ़ाने मांग कर रहे हैं।
जानकारी के अनुसार मौलिक शिक्षा अधिकार अधिनियम 2009 के तहत कक्षा छह से आठवीं तक बच्चों को फ्री व अनिवार्य रूप से शिक्षा प्रदान करने का प्रावधान है। पुस्तकें ,वर्दी व दोपहर का भोजन फ्री में दिए जाने की व्यवस्था है। विभाग ने कक्षा आठवीं तक बच्चों को दो वर्गों में बांट रखा है। एक प्राइमरी वर्ग व दूसरा अपर प्राइमरी वर्ग है इन दोनों वर्गों की श्रेणियों के बच्चों के लिए दोपहर के भोजन का खर्च सरकार की ओर से वहन किया जाता है। प्राइमरी व अपर प्राइमरी के बच्चों के लिए प्रति बालक अलग-अलग खर्च करने का प्रावधान है।
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-- इस समय स्कूलों में दोपहर के भोजन में चार दिन चावल व दो गेहूं से बने व्यंजन परोसे जा रहे हैं। इन व्यंजनों में मूंग-चावल की खिचड़ी के अलावा नमकीन चावल, चावल-चना खिचड़ी, सब्जी रोटी, दाल रोटी, सादा पका हुआ चावल ज्यादा मात्रा में खिलाया जा रहा है। दोपहर के भोजन में कुल 16 प्रकार के व्यंजन शामिल हैं जो प्रत्येक दिन के लिए अलग-अलग रूप में हैं।
पिछले करीब छह माह पहले सरकार व विभाग ने दोपहर के भोजन में दूध को शामिल करने की बात कही थी। विभाग अधिकारियों का तर्क था कि बच्चों को पौष्टिक भोजन मिले ऐसे में दूध को शामिल करना जरूरी है। दूध में व्याप्त पोषक तत्वों से बच्चे का शारीरिक व मानसिक विकास जल्द होता है। कुषोषण से बचाने में दूध काफी गुणकारी साबित होता है।
करीब तीन माह पहले भेजी जा चुकी संख्या
विभागीय सूत्रों के मुताबिक शिक्षा विभाग हैड ऑफिस की ओर से करीब तीन माह पहले स्कूलों की मिड-डे-मील बच्चों की कुल संख्या मांगी गई थी ताकि संख्या के अनुपात में बजट का निर्धारण किया जा सके लेकिन आज तक अब इस बारे में कोई सूचना तक नीचले स्तर के अधिकारियों के पास नहीं पहुंची है। ऐसे में स्कूलों में बच्चों को दूध नहीं मिल रहा है। दूध में प्रोटीन के अलावा, कैल्शियम, मैग्नीशियम, पोटाशियम, वसा, विटामिन के अन्य स्रोत प्रचुर मात्रा में मौजूद होते हैं।
बजट में प्रतिवर्ष की 7 प्रतिशत बढ़ोतरी भी नहीं हुई
इस समय प्राइमरी स्कूल के प्रत्येक बच्चे पर दोपहर के भोजन पर 4.13 रुपये खर्च किया जा रहा है जबकि अपर प्राइमरी यानी कक्षा छह से आठवीं तक के बच्चे पर 6.18 रुपये खर्च किया जा रहा है। चावल, दाल व गेहूं इस खर्च राशि में शामिल नहीं हैं। सरकार इस खर्च राशि में हर साल सात प्रतिशत बढ़ोतरी करती है। यह बढ़ोतरी हर साल जुलाई में की जाती है लेकिन इस बार प्रति बालक खर्च में यह बढ़ोतरी भी नहीं की गई है। बजट खर्च में बढ़ोतरी न होने से स्कूलों में मिड-डे-मील का काम संभाल रहे इंचार्ज के समक्ष सभी बच्चों के लिए भोजन की पूर्ति करना मुश्किल बना हुआ है।
राजकीय स्कूल के एक मिड-डे-मील इंचार्ज ने नाम छापने की शर्त पर बताया कि बजट में सात प्रतिशत बढ़ोतरी न करने पर अब उन्हें रोजाना तैयार होने वाले भोजन की मात्रा में कटौति करनी पड़ रही है ताकि थोड़ा-थोड़ा सभी बच्चों को भोजन मिल सके क्योंकि हर साल महंगाई के अनुपात में प्रति बालक लागत खर्च को बढ़ाया जाना जरूरी है। वहीं प्रत्येक बच्चे को भरपेट भोजन खिलाया जाना भी जरूरी है। वे आए दिन विभाग अधिकारियों से संपर्क कर रहे हैं।
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वर्सन-
करीब तीन माह से छात्रों की संख्या हैड ऑफिस भेज रखी है। जैसे ही दूध के बजट की प्लानिंग आएगी स्कूलों में बच्चों को दूध उपलब्ध करवाना शुरू कर दिया जाएगा।
बीईईओ कुलदीप सिंह
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