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जाट कालेज वर्कशॉप

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रोहतक। भारतीय सभ्यता में पांच हजार साल से भी पुराने शहरीकरण के अवशेष मिले हैं। इससे यह पता चलता है कि भारत में प्राचीन काल से ही लोग एक अच्छी और सुदृढ़ जीवनशैली के साथ जीवन-यापन करते थे। यह कहना है जापान के कनसाई विश्वविद्यालय के पुरातत्व विभाग के प्रोफेसर डॉ. अक्कीनौरी ऊसुगी का। प्रो. ऊसुगी मंगलवार को जाट कॉलेज के सभागार में इतिहास विभाग द्वारा ‘इतिहस के स्रोत’ विषय पर आयोजित एक दिवसीय अंतरराष्ट्रीय कार्यशाला में बोल रहे थे।
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प्रो. ऊसुगी ने हड़प्पा सभ्यता के बारे में बताया कि इसके मुख्य केंद्र हरियाणा, पंजाब, राजस्थान, गुजरात, पश्चिमी उत्तर प्रदेश व पूरे पाकिस्तान में मिलते हैं। यह एक शहरी सभ्यता थी, इस सभ्यता के लोग नियोजित नगरीकरण के बारे में संपूर्ण जानकारी रखते थे। इनके प्रमाण उत्खनित पुरास्थलों से मिलते हैं। उन्होंने कहा कि इस सभ्यता के लोग पांच हजार साल पहले अंतरराष्ट्रीय व्यापार में विशेष भूमिका निभाते थे। जिसकी मोहरें और मनके मैसोपोटामिया, मिस्र, यमन आदि समकालीन सयताओं से मिलते हैं। इससे प्रमाणित होता है कि इनके अंतरराष्ट्रीय व्यापारिक संबंध थे। इस अवसर पर कॉलेज के इतिहास विभाग के अध्यक्ष डॉ. राजबीर गुलिया, डॉ. विवेक दांगी, डॉ. मनीष गुलिया, डॉ. सरोज बाला, डॉ. जसमेर सिंह, डॉ. रेणू मलिक, डॉ. कमलेश दलाल, डॉ. चेतना, डॉ. सुप्रीया, डॉ. लक्ष्मी मौजूद रहे।
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लिखित सामग्री मौन होने पर सिक्कों से मिलती है जानकारी : डॉ. मनमोहन
वर्कशॉप में मुख्य वक्ता एमडीयू के इतिहास विभाग से प्रोफेसर डॉ. मनमोहन कुमार रहे। उन्होंने बताया कि जिस काल में लिखित सामग्री मौन हो जाती है उस काल के इतिहास के बारे में सिक्कों से जानकारी मिलती है। साहित्य में कांच नामक गुप्त शासक का जिक्र कहीं नहीं मिलता, लेकिन इस शासक के सिक्के विभिन्न पुरातात्विक स्थलों से मिलते हैं। इसके अलावा साहित्य के 5-6 हिन्द-यवन शासकों का जिक्र मिलता है, परंतु 40 से ज्यादा शासकों की जानकारी सिक्कों के माध्यम से मिलती है। उन्होंने कहा कि रोहतक के खोखराकोट क्षेत्र से 14 हिन्द-यवन शासकों के सिक्के प्राप्त हुए हैं।
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