विजेंद्र कौशिक
रोहतक। नगर निगम के फर्नीचर घोटाले को लेकर मेयर रेनू डाबला, सीनियर डिप्टी मेयर मंजु हुड्डा और डिप्टी मेयर अशोक भाटी ने निगम आयुक्त को पांच पेच का जवाब भेजा है। जवाब में न केवल विजिलेंस जांच रिपोर्ट को चुनौती दी गई है, बल्कि साफ लिखा है कि कोटेशन लेकर आना निगम मेयर, सीनियर डिप्टी मेयर और डिप्टी मेयर का काम नहीं है। निगम के अधिकारियों ने ही कोटेशन उनके सामने पेश की थी। जो सबसे कम रेट की कोटेशन लगी, उन पर उन्होंने हस्ताक्षर कर दिए। जवाब दाखिल होने से एक बार फिर निगम की सियासत गरमाने लगी है। भाजपा पार्षद और शिकायतकर्ता ने इसे कांग्रेसी पार्षदों द्वारा कार्रवाई उलझाने और लंबे खिंचने का प्रयास बताया है।
निगम के सूत्रों का कहना है कि मेयर रेनू डाबला, सीनियर डिप्टी मेयर मंजु हुड्डा और डिप्टी मेयर अशोक भाटी की तरफ से भेजे गए जवाब में बताया गया है कि 2014 में हाउस के अंदर जब प्रस्ताव पास हुआ, उस समय डीसी अमित अग्रवाल बतौर निगम आयुक्त, डीएमसी वाईएस गुप्ता भी मौजूद थे। उनकी मौजूदगी में सर्वसम्मति से प्रस्ताव पास हुआ। कमेटी में शामिल निगम के अधिकारियों ने तीन कोटेशन उनके सामने पेश की। जो कम रेट की कोटेशन लगी, तीनों पदाधिकारियों ने उस पर हस्ताक्षर कर दिए। साफ है कि कोटेशन लेने निगम की मेयर, सीनियर डिप्टी मेयर या डिप्टी मेयर तो नहीं जाएगी। इस तरह तीनों पदाधिकारियों को खरीद के लिए उत्तरदायी ठहराना कहां उचित है।
विजिलेंस बताए कैसे निकाला 1 लाख 39 हजार का अंतर
जवाब में लिखा गया है कि विजिलेंस की जो जांच रिपोर्ट है, उसके अंदर मेज, कुर्सी व दूसरे फर्नीचर के रेट का अंतर निकाल कर 1 लाख 39 हजार की आर्थिक गड़बड़ी दर्शाई गई है। जांच रिपोर्ट में विजिलेंस ने यह नहीं लिखा कि मार्केट में रेट की जांच करते समय तुलनात्मक तौर पर किस फर्म पर किस कंपनी की मेज या कुर्सी का रेट लिया। क्योंकि मार्केट में कुर्सी और मेज के अलग-अलग रेट हैं।
शिकायत करने वालों ने खुद दिया संतुष्टी पत्र
निगम ने फर्नीचर खरीदकर सभी पार्षदों के पास भेज दिया। पार्षदों ने फर्नीचर रखकर रिसीविंग और संतुष्टी पत्र पर हस्ताक्षर किए हैं। इसमें वे पार्षद भी शामिल है, जो उनके खिलाफ शिकायत देकर कार्रवाई की मांग कर रहे हैं।
अकाउंटेंट और एमई पहले ही दे चुके हैं जवाब
उधर, खरीद कमेटी में शामिल निगम अकाउंटेंट विकास गुलिया और म्यूनिसिपल इंजीनियर जगदीश चंद्र एक सप्ताह के अंदर ही जवाब दे चुके हैं। निगम के दोनों अधिकारियों ने तो विजिलेंस को भी बयान दिए थे। कहा था कि कमेटी के सदस्यों के हस्ताक्षर युक्त कोटेशन कार्यालय के कार्य के लिए पहुंची। निगम आयुक्त की तरफ से भी खरीददारी की स्वीकृति दी गई थी। इसके बाद वर्क आर्डर जारी किया गया। पार्षदों को फर्नीचर मिलने के बाद भुगतान किया गया।
यह रहा मामला
नगर निगम हाउस ने 2014 में हर वार्ड के अंदर पब्लिक सुविधा केंद्र खोलने के लिए फर्नीचर खरीदने का फैसला किया गया। इसके लिए तीन कोटेशन मंगवाई गई। एक फर्नीचर व्यापारी से 18 लाख से ज्यादा में फर्नीचर खरीदा गया। जनवरी 2015 में निगम की ओर से राशि जारी कर दी गई। तभी सवाल उठने लगे कि निगम ने यह फर्नीचर मार्केट रेट से ज्यादा पैसे में खरीदा है। बाद में फर्नीचर सप्लाई करने वाले व्यापारी ने एक लाख 42 हजार रुपये का चैक वापस निगम के खाते में जमा करवा दिया। जांच के दौरान केस की प्रापर्टी मानकर निगम की अकाउंट ब्रांच ने अभी तक चैक को भुनाया नहीं है। मामले की पहले ट्रेनिंग पर आए आईएएस अधिकारी विक्रम सिंह ने जांच की। 2016 में विजिलेंस ने ज पड़ताल की। विजिलेंस ने जांच में फर्नीचर की खरीद में वित्तीय अनियमितता मानी है। पिछले साल अक्टूबर माह से विजिलेंस की जांच रिपोर्ट चंडीगढ़ मुख्यालय में कार्यालयों के चक्कर काट रही है।
जांच को लंबा खिंचना चाहते हैं कांग्र्रेसी
फर्नीचर खरीद मामले में विजिलेंस जांच में सबकुछ साफ हो चुका है। बेवजह मामले को लटकाया जा रहा है। कांग्रेसी मामले को और ज्यादा लंबा खिंचना चाहते है। सरकार को समय रहते कार्रवाई करनी चाहिए। 9 माह बाद तो कार्यकाल ही पूरा हो जाएगा।
अशोक खुराना, भाजपा पार्षद एवं शिकायतकर्ता
फर्नीचर खरीद करने वाली कमेटी में निगम के अधिकारी भी शामिल थे। वित्त आयुक्त की अनुमति से डिप्टी कमिश्नर वाईएस गुप्ता की मार्ग दर्शन में नियमों के तहत फर्नीचर खरीदा गया। ऐसे में वे कैसे उत्तरदायी हो सकती हैं। विजिलेंस जांच में भी यह नहीं बताया गया कि मार्केट से रेट लेते समय किस फर्म पर किस कंपनी के फर्नीचर के रेट पूछे गए। पूरा मामला राजनीति से प्रेरित है। इसमें मेयर, सीनियर डिप्टी मेयर और डिप्टी मेयर की कोई भूमिका नहीं है। उन्होंने आयुक्त को अपना जवाब दाखिल कर दिया है, जिस पर तीनों पदाधिकारियों के हस्ताक्षर हैं।
रेनू डाबला, मेयर