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शहर के होटलों और ढाबों पर 800 किलोग्राम प्रतिदिन जल रहा कोयला

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शहर के होटलों और ढाबों पर 800 किलोग्राम प्रतिदिन जल रहा कोयला
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चरखी दादरी।
एनजीटी (नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल) के आदेशों पर जिला प्रशासन ने भले ही क्रेशरों व बिना जिग-जैग संरचना वाले ईंट-भट्ठों के संचालन पर रोक लगा दी हो लेकिन शहर में कोयले की खपत चिंता का विषय है। शहर के करीब 80 ढाबों व होटलों पर प्रतिदिन 800 किलोग्राम कोयले की खपत होती है। कोयले का प्रयोग तंदूर जलाने के लिए किया जाता है। पर्यावरण के मुताबिक 800 किलोग्राम कोयले की प्रतिदिन खपत स्मॉग बनने का प्रमुख कारण है। इसके बावजूद जिला प्रशासन का ढाबों व होटलों पर धड़ल्ले से चलाए जा रहे तंदूरों की तरफ ध्यान नहीं गया है। अगर प्रशासन ने ध्यान नहीं दिया तो तंदूर का बेरोक-टोक प्रयोग शहरवासियों की सेहत बिगाड़ सकता है। वहीं, शहर में कूड़े-कचरे और पराली को आग लगाने के मामले भी लगातार सामने आ रहे हैं प्रशासन इन पर कोई कार्रवाई नहीं कर रहा।
शहर में स्मॉग के कारण काफी लोग बीमारियों की चपेट में आ रहे हैं। इससे अस्पतालों की ओपीडी भी 50 फीसदी तक बढ़ी है। नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल के हाई अलर्ट जारी करने के बाद प्रशासन ने हरकत में आते हुए शुक्रवार को क्रेशरों व बिना जिग-जैग संरचना वाले ईंट-भट्ठों के संचालन पर रोक लगा दी लेकिन शहर के छोटे-बड़े होटलों व ढाबों की तरफ अब तक ध्यान नहीं दिया। नाम न छापने की शर्त पर कोयला गोदाम के मालिक ने बताया कि शहर के होटलों व ढाबों पर कोयला सबसे अधिक प्रयोग होता है और इसकी प्रतिदिन खपत करीब 800 किलोग्राम है। यह आंकड़ा शहर की बिगड़ी आबोहवा को देखते हुए गंभीर है जबकि जिला प्रशासन ने अभी तक इस संदर्भ में कोई निर्देश जारी नहीं किए हैं। अमर उजाला टीम ने ढाबों में कोयले के प्रयोग की ग्राउंड रिपोर्ट का पता लगाया तो लगभग हर छोटे होटल या ढाबे में रखे तंदूर में संचालक कोयला या लकड़ी प्रयोग करते मिले। इस संबंध में जब जनता कालेज के प्राचार्य व पर्यावरण विद् डॉ. आरएन यादव से बात की गई तो उन्होंने जो खुलासे किए वो शहरवासियों को चौकन्ना करने वाले थे। उन्होंने बताया कि कोयले का इतनी प्रचुर मात्रा में प्रयोग भी स्मॉग का कारण है और इसका सीधे तौर पर असर फेफड़ों व तंत्र-तंत्रिकाओं पर पड़ता है। अमर उजाला ने 11 नवंबर के संस्करण में ‘स्मॉग से जहरीली हुई आबोहवा, अस्पतालों की ओपीडी 50 फीसदी तक बढ़ी’ नामक शीर्षक से खबर प्रकाशित की थी। वहीं, स्वास्थ्य विभाग के अधिकारी इस वातावरण को बीमारियां फैलाने वाला बता कर लोगों से सावधानियां बरतने की अपील कर रहे हैं।
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गैस भट्ठी से सस्ता पड़ता है कोयला
होटल संचालकों ने तंदूर में कोयला प्रयोग करने का प्रमुख कारण इसका सस्ता होना बताया। नाम न छापने की यार्त पर होटल संचालक ने बताया कि गैस भट्ठी पर अगर 30 हजार रुपये प्रतिमाह खर्च आता है तो कोयला प्रयोग पर यह लागत 20 हजार रुपये तक सीमित रहती है। हालांकि अगर पर्यावरण की बात करें तो कोयले का प्रयोग बेहद नुकसानदायक है।
क्या कहना है पर्यावरणविद् का
पर्यावरणविद् डॉ. आरएन यादव ने बताया कि कोयला जलने से कार्बन मोनो ऑक्साइड, कार्बन डाइ ऑक्साइड व मिथिन गैस निकलती है। उन्होंने बताया कि ये गैसें उपर जाकर स्मॉग का रूप धारण कर लेती है जोकि मनुष्य व जीव-जंतुओं के स्वास्थ्य के लिए बेहद खतरनाक है। उन्होंने बताया कि स्मॉग का असर तंत्र-तंत्रिका, श्वसन तंत्र, आंखों, पेट व चर्म पर अधिक पड़ता है। उन्होंने बताया कि स्मॉग से खांसी-जुकाम व बलगम बनने के मामले भी ज्यादा सामने आते हैं। पर्यावरणविद् का मानना है कि स्मॉग से बीमारियों ही नहीं फैलती बल्कि इसका सीधे तौर पर असर अर्थव्यवस्था पर भी पड़ता है। पर्यावरणविद् की मानें तो कोयले में तीन प्रतिशत तक सल्फर होता है और नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल प्रदूषण फैलाने वाले हर उद्योग, छोटी इंडस्ट्री पर लगाम लगाने के निर्देश जारी कर चुका है। इसके बावजूद शहर में धड़ल्ले से कोयले का जमकर प्रयोग किया जा रहा है लेकिन प्रशासन का इस और ध्यान ही नहीं है। पर्यावरणविद् 800 किलोग्राम कोयले का प्रतिदिन प्रयोग वातवारण व लोगों के स्वास्थ्य के लिए बेहद नुकसानदायक मान रहे हैं। छोटे व बड़े होटल संचालक नान व मिसी रोटी तैयार करने के लिए तंदूरों में कोयले व लकड़ी को जलाकर नियमों को खाक में मिला रहे है।
ढाई लाख का कोयला जलता है शहर में प्रतिदिन
कोयला व्यापारियों की मानें तो जिले में प्रतिदिन ढाई लाख रुपये तक के कोयले की बिक्री होती है। बीते कुछ दिनों की बात करें तो इस आंकड़े में कोई कमी नहीं आई है। कोयला विक्रेता ने बताया कि होटल संचालक कोयले की खरीद अधिक करते है। बाजार में कोयला 30 रुपये किलो बिक रहा है। सर्दियों में कोयले की बिक्री अधिक होती है और शहर में रूटीन कोयले की खपत बढ़ने का अनुमान है।
नप परिसर के बैक साइड कचरा तो घिकाड़ा रोड स्थित फैक्ट्री के बाहर जलाई पराली
इन विकट हालातों में भी शहर के अंदरुनी भागों में कचरा व बाहरी क्षेत्रों में पराली जलाने की घटनाएं सरेआम देखने को मिल रही है। शनिवार को नगर परिषद कार्यालय के बैक साइड पड़े कचरे को अज्ञात ले तीली दिखा दी। दिन-दहाड़े कूड़ा जलाने वाले पर न तो नगर परिषद कार्रवाई कर रही है और न ही प्रदूषण नियंत्रक बोर्ड के अधिकारी। इसके अलावा घिकाड़ा रोड स्थित एक फैक्ट्री की दीवार के साथ भथी दिनदहाड़े अज्ञात ने पराली जलाई लेकिन यहां भी किसी प्रशासनिक अधिकारी ने पहुंचकर कार्रवाई करने की जहमत नहीं उठाई।
वर्जन::
कर्मचारियों को कूड़ा न जलाने के हमने निर्देश दे रखे हैं। एक-दो कर्मचारियों को चेतावनी भी दी गई थी। कूड़ा जलाना सरासर गलत है और ऐसा करने वाला चाहा नप कर्मचारी हो या लोग, हम पकड़े जाने पर कार्रवाई करेंगे।
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संजय यादव, सचिव नगर परिषद
वर्जन::
कोयला के प्रयोग पर भी प्रशासन ने बैन लगाया है। अगर कोई होटल या ढाबा संचालक ऐसा कर रहा है तो हम मौके पर जाकर कार्रवाई करेंगे। एनजीटी के स्पष्ट आदेश है कि प्रदूषण के स्तर को नीचे लाने के लिए प्रशासन कड़े कदम उठाएं।
ओमप्रकाश देवराला, एसडीएम
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