एंबुलेंस का टोटा झेल रहे शहर के नागरिक अस्पताल में बदहाली का आलम इस कदर हावी है कि परिसर में करीब एक साल से खड़ी तीन गाड़ियां बिना चले ही बेदम हो गई हैं। मुख्य गेट के पास खड़ी इन गाड़ियों पर स्वास्थ्य विभाग के उच्चाधिकारियों की नजर भी पड़ती है लेकिन कभी किसी ने इनकी कोई सुध नहीं ली। बीते दिनों एक प्रसूता की तबीयत बिगड़ने के बाद तीन घंटे तक उसे एंबुलेंस उपलब्ध नहीं हो पाई थी। इस कारण प्रसूता ने पीजीआई रोहतक जाते ही दम तोड़ दिया था।
शहर के नागरिक अस्पताल एवं ट्रॉमा सेंटर में प्रतिदिन अनेक गंभीर मरीज आते हैं। उनके लिए एंबुलेंस की आवश्यकता पड़ती है लेकिन सेवा पर कार्यरत कर्मचारी एंबुलेंस उपलब्ध नहीं होने की बात कहकर मना कर देते हैं। ऐसे में तीमारदारों के पास निजी वाहन में मरीजों को लाने के सिवाय कोई चारा नहीं होता है। स्वास्थ्य विभाग व्यवस्थाओं की बदहाली से निकलकर यहां खड़ी गाड़ियों का संचालन ठीक से करे तो लोगों की जान बचाई जा सकती है।
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दस लाख की आबादी पर महज 14 एंबुलेंस
जिले की दस लाख की आबादी को आपात स्थिति में स्वास्थ्य सेवा मुहैया कराने के लिए महल 14 एंबुलेंस हैं। जिले की पांच पीएचसी 21 सीएससी और सब सेंटर के लिए दस और नागरिक अस्पताल एवं ट्रॉमा के लिए चार एंबुलेंस मौजूद हैं। इनमें से भी अधिकतर समय एक एंबुलेंस खराब पड़ी रहती है। ऐसे में सरकारी लचर व्यवस्था का खामियाजा जरूरतमंदों को उठाना पड़ रहा है। यदि नागरिक अस्पताल में खड़ी तीन गाड़ियां सड़क पर आ जाएं तो नागरिक अस्पताल में एंबुलेंस की संख्या बढ़कर सात हो जाएगी।
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प्रसूताओं को भी नहीं मिल पाती एंबुलेंस
कहने के लिए सरकार की तरफ से जननी सुरक्षा के नाम पर अलग से एंबुलेंस उपलब्ध करवाई है। केवल नागरिक अस्पताल में डिलीवरी के दबाव के कारण प्रसूताओं तक को समय पर एंबुलेंस उपलब्ध नहीं हो पाती है। नागरिक अस्पताल में एक महीने मे करीब साढ़े चार सौ डिलीवरी होती हैं।
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कोट
मामला मेरे संज्ञान में नहीं था। आपके माध्यम से मामला मेरे पास आया है। मामले की जांच कराई जाएगी। इसमें जिसकी लापरवाही मिलेगी, उसके खिलाफ कार्रवाई की जाएगी। - डॉ. बीके राजौरा, सीएमओ, रेवाड़ी।