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निजी स्कूलों की मनमानी : सस्ती चीजें पैकेज में महंगी बेचने का खेल

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नई बाजार में एक स्टेशनरी दुकान पर किताबें व स्टेशनरी खरीदते अभिभावक। संवाद
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रेवाड़ी। जिले में निजी स्कूलों की हर साल मनमानी देखने को मिलती है। इस बार भी यही हालात हैं। कई स्कूल संचालकों ने अपनी-अपनी दुकानें फिक्स कर रखी हैं जहां अभिभावकों को बच्चों की किताबें और स्टेशनरी खरीदने के लिए बाध्य किया जाता है।
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इन दुकानों पर संबंधित स्कूल का पूरा कोर्स पैकेज के रूप में उपलब्ध होता है जबकि अन्य दुकानों पर वही सामग्री नहीं मिलती। इस व्यवस्था के कारण खुले बाजार में सस्ते मिलने वाले सामान को भी पैकेज के नाम पर महंगे दामों में बेचा जा रहा है।
इसमें 12 सेट सिंगल लाइन रजिस्टर, नोटबुक, स्क्रैप बुक, ड्राइंग बुक, कलर, ब्रश और नोटबुक कवर तक शामिल किए जा रहे हैं।
अभिभावकों का कहना है कि यदि वे बाहर से सामान खरीदने की बात करते हैं तो स्कूल प्रशासन उन्हें मना कर देता है या फिर उसी निर्धारित सूची के अनुसार सामान लाने के लिए बाध्य करता है जिसमें स्कूल नाम वाली कॉपियां अनिवार्य होती हैं।
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इससे दुकानदारों को मनमाने दाम वसूलने की खुली छूट मिल जाती है और अभिभावकों के पास कोई दूसरा विकल्प नहीं बचता। इसका सीधा असर कीमतों पर पड़ता है जो सामान्य दरों से 10 से 20 गुना तक अधिक वसूली जा रही हैं।
निजी स्कूलों में किताबों के साथ-साथ स्टेशनरी के दाम भी अभिभावकों पर भारी पड़ रहे हैं। यदि किताबों की कीमतों की बात करें तो कक्षावार दरें भी काफी अधिक सामने आई हैं।
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यह है किताबों का मूल्य
कक्षा पहली के लिए 1268 रुपये, कक्षा दूसरी के लिए 1277 रुपये, कक्षा तीसरी के लिए 1630 रुपये, कक्षा चौथी के लिए 2040 रुपये और कक्षा पांचवी के लिए 2050 रुपये तक वसूले जा रहे हैं। वहीं, स्टेशनरी में भी मनमानी सामने आई है। सिंगल लाइन कॉपी (2) के लिए 40 रुपये के मुकाबले 50 रुपये, इंटरलीफ (3) 60 की जगह 75 रुपये, स्क्रैप बुक 40 की बजाय 50 रुपये और ड्राइंग बुक 60 के स्थान पर 100 रुपये तक में बेची जा रही है। इसी तरह कलर बॉक्स, जो सामान्यत करीब 50 रुपये में उपलब्ध होता है, उसके लिए 200 से अधिक रुपये तक वसूले जा रहे हैं। ब्रश सेट 30 की जगह 50 रुपये में दिया जा रहा है जबकि अन्य सामग्री भी 80 रुपये के मुकाबले 120 रुपये तक बेची जा रही है।
अभिभावकों की प्रतिक्रिया
स्कूल ने जो दुकान बताई, वहीं से किताबें लेनी पड़ीं। कीमत इतनी ज्यादा थी कि मोलभाव तक नहीं कर सकते। बाहर कहीं और ये किताबें मिलती ही नहीं हैं। -आरती यादव
दो बच्चों की किताबों पर ही हजारों रुपये खर्च हो गए। अगर विकल्प मिलता तो शायद इससे भी सस्ती किताबें मिल जातीं लेकिन यहां तो पूरी तरह से मजबूरी है। -जितेंद्र
स्कूल की तय दुकान से ही किताबें खरीदनी पड़ीं जिससे खर्च काफी बढ़ गया और कोई दूसरा विकल्प नहीं मिला। -मनीष कुमार
महंगी किताबों और स्टेशनरी के कारण बजट बिगड़ गया है लेकिन बच्चों की पढ़ाई के लिए मजबूरी में खरीदना पड़ा। -मंजू वशिष्ठ
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शिकायत मिलने पर जांच होगी, कार्रवाई करेंगे : डीईओ
निजी विद्यालयों को निर्देश दिए गए हैं कि वे स्कूल में किताबें, ड्रेस या स्टेशनरी नहीं बेचेंगे और न ही किसी एक दुकान को तय करेंगे। किताबें व सामान कई दुकानों पर उपलब्ध कराना जरूरी होगा ताकि अभिभावक अपनी सुविधा से खरीद सकें। निर्देशों के उल्लंघन पर सख्त कार्रवाई होगी। महंगी किताबें खरीदने का दबाव नहीं बनाया जा सकता। शिकायत मिलने पर जांच कर कार्रवाई की जाएगी। अभिभावकों से भी अनियमितता की जानकारी देने की अपील की गई है। -विजेंद्र हुड्डा, जिला शिक्षा अधिकारी रेवाड़ी।

नई बाजार में एक स्टेशनरी दुकान पर किताबें व स्टेशनरी खरीदते अभिभावक। संवाद

नई बाजार में एक स्टेशनरी दुकान पर किताबें व स्टेशनरी खरीदते अभिभावक। संवाद

नई बाजार में एक स्टेशनरी दुकान पर किताबें व स्टेशनरी खरीदते अभिभावक। संवाद

नई बाजार में एक स्टेशनरी दुकान पर किताबें व स्टेशनरी खरीदते अभिभावक। संवाद

नई बाजार में एक स्टेशनरी दुकान पर किताबें व स्टेशनरी खरीदते अभिभावक। संवाद

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