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स्टील ने ली पीतल की जगह

Tue, 25 Oct 2016 11:42 PM IST
अमर उजाला ब्यूरो
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पीतल के बर्तन
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दीपावली पर्व पर पीतल-कांसी के बर्तनों की खरीददारी हमारे रीत-रिवाज का बड़ा हिस्सा है। समय के साथ पीतल-कांसी की जगह स्टेनलेस स्टील और एलुमिनियम के बर्तनों ने ले ली है। आज स्थिति यह है कि पीतल नगरी कही जाने वाले रेवाड़ी में ना तो पीतल-कांसी बनाने वाले ना तो कारीगर रहे और ना ही इन बर्तनों को खरीदने वाले ग्राहक।
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कुछेक ग्राहक शौक और त्योहार के लिहाज से धनतेरस पर पीतल-कांसी एक-दो बर्तन जरूर खरीद लेते हैं, लेकिन दैनिक जीवन में उपयोग स्टील व एलुमिनियम के बर्तनों का ही उपयोग करते हैं। बर्तन व्यापारी घनश्यामदास भालिया की माने तो त्योहारी सीजन में भी पीतल-कांसी के बर्तनों की खरीद केवल 15 से 20 फीसदी है, जबकि स्टील के बर्तन का व्यापार 60 प्रतिशत के लगभग है। लगभग 20 साल पहले घरों में सभी बर्तन पीतल-कांसी के ही इस्तेमाल किए जाते थे। लोग शादी-ब्याह में बेटी को भेंट स्वरूप 11, 21 आदि पीतल-कांसी के बर्तन देते थे। वहीं इसकी जगह अब स्टील के बर्तनों ने ले ली है।

क्रॉकरी-कटलरी ने किया पीतल का पतन
पहले एलुमिनियम, स्टेनलैस स्टील और अब चीनी मिट्टी से बनी फैंसी क्रॉकरी हमारी खाने की टेबल पर जगह बना चुकी हैं। चम्मच से लेकर कप-प्लेट तक सभी फैंसी क्राकरी आइटम हमारी मॉडर्न पसंद बन चुके हैं। बच्चे भी ऐसे बर्तनों में भोजन करना पसंद करते हैं।
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पीतल महंगा जरूर, लेकिन स्वास्थ्यवर्धक
बाजार में पीतल के बर्तन स्टील व एलुमिनियम की तुलना में तीन गुना महंगे जरूर हैं, लेकिन स्वास्थ्य की दृष्टि से उत्तम है। दीपावली पर पीतल के बर्तन के भाव 350 से 400  रुपए प्रति किलो तथा स्टील 120 से 150 रुपए प्रति किलो के हिसाब से बिक रहा है। पीतल के बर्तनों में भोजन पकाना व खाना सेहत के लिए उत्तम बताया गया है, जबकि एलुमिनियम और स्टील में भोजन की पौष्टिक पूरी खत्म हो जाती है।

अब पीतल की कढ़ाई में नहीं बनता हलवा
एक समय था जब हमारे बुजुर्ग पीतल की कढ़ाई में पूरे परिवार के लिए हलवा बनाते थे। लेकिन अब हम तीज-त्योहारों पर बाहर किसी होटल या रेस्तरां में जाकर अपने मन को संतुष्ट कर लेते हैं। उस समय भोजन बनाने से लेकर खाने तक पीतल के बर्तन ही इस्तेमाल किए जाते थे, जिनमें टोकनी, परात, थाली, कटोरा, कढ़ाई आदि बर्तन शामिल थे। तीज-त्योहार पर पीतल-कांसी के बर्तन में बना हलवा, खीर व अन्य चीजों का अलग ही स्वाद होता था।  

शहर में बचे 50 पीतल कारोबारी
डेढ़ दशक पहले रेवाड़ी में 550 परिवार पीतल का कारोबार करते थे। वर्तमान में 50 कारीगर ही ऐसे हैं, जो पीतल के बर्तनों का काम करते हैं। स्टील व क्रॉकरी आइटमों के चलन और सरकार की ओर से पीतल कारोबार को सहयोग न मिलने के कारण पीतल कारीगर इस व्यवसाय से दूर होते जा रहे हैं। आज ये कारीगर मजदूरी, रेहड़ी संचालन या नौकरी कर अपने परिवार का भरण-पोषण कर रहे हैं।

वर्जन
त्योहारों पर भी पीतल-कांसी के बर्तनों की खरीद नहीं है। एक समय था जब हम केवल पीतल-कांसी के बर्तन ही बेचा करते थे, लेकिन अब हमारी दुकान में स्टील, एलुमिनिय के बर्तनों ने जगह बना ली है।
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घनश्याम दास भालिया, बर्तन व्यापारी
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