दिल्ली के रिहायशी क्षेत्र में चल रही फैक्ट्री में अचानक आग लगने से तीन दर्जन से अधिक लोगों की मौत के बाद भी रेवाड़ी प्रशासन की आंख नहीं खुली हैं। धारुहेड़ा व बावल की विभिन्न कॉलोनियों में सुरक्षा संबंधी नियमों को ताक पर रखकर 100 से अधिक फैक्ट्रियां चलाई जा रही हैं। जबकि यहां भी कई बार फैक्ट्रियों में आग लगने के बड़े हादसे हो चुके हैं। बावल में लगी आग में तीन श्रमिकों की मौत तक हो चुकी है। इसके बावजूद भी रिहायशी क्षेत्रों में निर्बाध रूप से फैक्ट्रियां संचालित की जा रही हैं। हालांकि फैक्ट्री मालिकों के पास दमकल, पर्यावरण समेत अन्य विभागों का अनापत्ति प्रमाण होना जरूरी है। लेकिन हालात ऐसे हैं कि इस तरह की एक भी फैक्ट्री के पास एनओसी नहीं है।
सुरक्षा उपायों की अनदेखी, पर्यावरण के लिए खतरा
धारूहेड़ा व बावल के अलावा दिल्ली रोड स्थित उत्तमनगर, विजय नगर, आर्य नगर, नारनौल रोड व दिल्ली रोड पर प्लास्टिक पाइप, बिस्किट, नमकीन, गज्जक, रेवड़ी व ज्वलनशीन पदार्थों की फैक्ट्रियां रिहायशी इलाके में अवैध रूप से चलाई जा रही है। कई बार नगर परिषद से लेकर उपायुक्त दरबार में भी यह मुद्दे उठाए जा चुके हैं। रिहायशी इलाकों में ये फैक्ट्रियां ध्वनि प्रदूषण फैला रहीं हैं। मशीनों व जनरेटर की आवाज से बच्चों व बुजुर्गो को सबसे अधिक परेशानी होती है। कई जगह तो फैक्ट्रियां नर्सिग होम व स्कूलों के आसपास चल रहीं हैं। फैक्ट्रियों में हानिकारक रसायनों का प्रयोग किया जाता है। रसायन नालियों में बहा दिया जाता है। जिससे आंखों में जलन व एलर्जी होती हैं। फैक्ट्रियों में आग से बचाव के उपकरण तक नहीं होते हैं।
आखिर क्यों नहीं होती निगरानी
रिहायशी क्षेत्र में फैक्ट्री चलाने पर पूरी तरह से पाबंदी है। औद्योगिक क्षेत्र में फैक्ट्री चलाने के लिए आधा दर्जन से अधिक विभागों से एनओसी जरुरी है। इनमें ये विभाग शामिल हैं।
इन विभागों की जिम्मेदारी
श्रम विभाग की ओर से शहर के अंदर कितनी रजिस्टर्ड फैक्ट्री हैं और शहर के किन रिहायशी क्षेत्रों में या शहर के बाहर कितनी फैक्ट्रियां चल रही हैं इसकी जांच करनी होती है। मजदूरों का रिकार्ड रखने के साथ-साथ समय पर जांच करना भी इसी विभाग की जिम्मेदारी है। मजदूरों को सुविधाएं सही से मिल रही हैं या नहीं यह भी जिम्मा लेबर विभाग पर ही होता है। जिला में लेबर विभाग के अधिकारियों को यह भी नहीं पता कि कुल कितनी फैक्ट्रियां कहां चल रही हैं और कितनी रजिस्टर्ड हैं। फैक्ट्रियों के अंदर जांच किए जाने कभी कोई रिपोर्ट नहीं बनाई जाती और न ही कभी किसी फैक्ट्री पर कोई कार्रवाई की जाती।
अग्निशमन विभाग की ओर से फैक्ट्रियों के अंदर अग्नि रोधक यंत्र हैं या नहीं के अलावा उनकी हालात के बारे में जानकारी रखनी होती है। फैक्ट्री तक अग्निशमन विभाग की गाड़ी पहुंचने की क्या व्यवस्था है भी या नहीं एनओसी देने से पहले ये देखना सबसे जरूरी होता है।
सेफ्टी एंड हेल्थ विंग विभाग की ओर से फैक्ट्रियों के अंदर जाकर वहां की बिल्डिंग की स्थिति, मशीनों के हालात, उनके पैनल और मजदूरों की सुरक्षा संबंधी जांच करनी होती है। जिला सेफ्टी एंड हेल्थ विंग जांच के नाम पर औपचारिकता करता है। विभाग के अनुसार सभी फैक्ट्रियों में अब ठीक चल रहा है लेकिन फिर भी हादसे हो रहे हैं।
बिजली विभाग की ओर से भी फैक्ट्रियों की जांच कर रिपोर्ट तैयार की जाती है। इसमें बिजली की क्या व्यवस्था है और बिजली की फिटिंग कैसी है। क्योंकि ज्यादातर फैक्ट्रियों में आग लगने का कारण शॉर्ट सर्किट रहता है। बीते सालों की बात करें तो बिजली निगम की ओर से कितनी फैक्ट्रियों की बिजली व्यवस्था की जांच की और कहां क्या खामी मिली इसकी कोई रिपोर्ट तैयार ही नही की गई है।
शहरी क्षेत्र खासकर रिहायशी क्षेत्र में किसी भी प्रकार की कमर्शियल एक्टिविटी करने के लिए नगर परिषद के अधिकारियों की ओर से एनओसी लेनी होती है। लेकिन नगर परिषद अधिकारियों के पास शहर के पूरे आंकड़े तक उपलब्ध नही हैं। कई बार कॉलोनीवासी नप कार्योलयों में जाकर शिकायत भी करते हैं, लेकिन हालात में कोई परिवर्तन नहीं आता है। चार साल पूर्व जरुर नप की ओर से एक फैक्ट्री सील की गई थी, इसके बाद आज तक कोई कार्रवाई नहीं हो पाई है।