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Rewari News: बिजली चोरी के मामलों में विशेष अदालत ही तय करेगी सिविल देनदारी

Fri, 29 May 2026 11:33 PM IST
रोहतक ब्यूरो संवाद न्यूज एजेंसी, रेवाड़ी
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रेवाड़ी। अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश जतिन गर्ग की अदालत ने बिजली चोरी के एक मामले में उपभोक्ता को आंशिक राहत दी है। अदालत ने दक्षिण हरियाणा बिजली वितरण निगम की ओर से जारी 24,244 रुपये के आकलन आदेश को अवैध करार देते हुए 4 हजार रुपये की कंपाउंडिंग फीस संबंधी नोटिस को वैध माना। कोर्ट ने कहा कि बिजली चोरी हुई या नहीं, इसका अंतिम निर्णय केवल विशेष अदालत ही कर सकती है।
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कोर्ट ने कहा कि सामान्य सिविल अदालत जांच रिपोर्ट की वैधता पर फैसला नहीं दे सकती। निगम को कानून के अनुसार विशेष अदालत में सिविल देनदारी तय कराने की स्वतंत्रता भी दी गई है। यह मामला दक्षिण हरियाणा बिजली वितरण निगम की ओर से लगाए गए बिजली चोरी के आरोप और उससे संबंधित वसूली से जुड़ा था।
गांव गंगायचा जाट निवासी अनुराधा ने अदालत में दावा किया था कि उनके घरेलू बिजली कनेक्शन पर निगम ने गलत तरीके से बिजली चोरी का आरोप लगाया। निगम ने 9 दिसंबर 2021 को उन्हें 24,244 रुपये आकलन शुल्क और 4 हजार रुपये कंपाउंडिंग फीस जमा कराने के नोटिस जारी किया था।
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शिकायतकर्ता का कहना था कि अधिकारियों ने उनकी अनुपस्थिति में मीटर हटाया और बाद में सीधे बिजली उपयोग का आरोप लगा दिया। उन्होंने यह बताया कि वह 78 प्रतिशत दिव्यांग हैं और उनके पति पूर्ण रूप से दृष्टिहीन हैं। इसलिए उनके द्वारा बिजली चोरी करना संभव नहीं है।
दूसरी ओर निगम ने अदालत में कहा कि 7 दिसंबर 2021 को जांच के दौरान शिकायतकर्ता को दूसरे उपभोक्ता की लाइन से सीधे बिजली लेते हुए पकड़ा गया था। निगम ने दावा किया कि मौके पर विभागीय टीम मौजूद थी और नियमों के अनुसार कार्रवाई की गई।
27 मई को अदालत ने सुनवाई के दौरान बिजली अधिनियम 2003 की विभिन्न धाराओं का अध्ययन किया और पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट के कई फैसलों का हवाला दिया। अदालत ने माना कि बिजली चोरी के मामलों में निगम स्वयं उपभोक्ता पर आर्थिक दायित्व तय नहीं कर सकता। ऐसे मामलों में केवल विशेष अदालत ही उपभोक्ता की सिविल सिविल देनदारी तय करने का अधिकार रखती है।
फैसले में कहा गया कि निगम द्वारा जारी किया गया 24,244 रुपये का आकलन आदेश कानून के प्रावधानों के विपरीत था, इसलिए उसे निरस्त किया जाता है। साथ ही अदालत ने आदेश दिया कि शिकायतकर्ता द्वारा जमा कराई गई यह राशि भविष्य के बिजली बिलों में समायोजित की जाए।
अदालत ने कंपाउंडिंग फीस के नोटिस को वैध माना क्योंकि यह केवल उपभोक्ता को समझौते का विकल्प देने के लिए जारी किया गया था। अदालत ने स्पष्ट किया कि कंपाउंडिंग फीस जमा कर शिकायतकर्ता ने आपराधिक मुकदमे से राहत प्राप्त की थी, इसलिए अब उसकी वापसी नहीं की जा सकती।
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