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Rewari News: कैसे स्वच्छ हो पर्यावरण, रेवाड़ी में सिर्फ 3.96% वन क्षेत्र

Wed, 05 Feb 2025 12:04 AM IST
रोहतक ब्यूरो संवाद न्यूज एजेंसी, रेवाड़ी
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संवाद न्यूज एजेंंसी
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रेवाड़ी। दक्षिणी हरियाणा में सिर्फ सात फीसदी भू-भाग पर पेड़ हैं। ऐसे में स्वच्छ पर्यावरण की उम्मीद नहीं की जा सकती है। वन क्षेत्र कम होने पर सुप्रीम कोर्ट भी चिंता जता चुका है। दक्षिणी हरियाणा में रेवाड़ी, महेंद्रगढ़, दादरी, भिवानी, गुरुग्राम व कुछ भाग झज्जर का शामिल है। रेवाड़ी में सिर्फ 3.96 फीसदी वन क्षेत्र है।
दक्षिणी हरियाणा में सरकारी जंगल 3.8 % और गैर सरकारी जंगल 2.8% है। कुल सात प्रतिशत भू-भाग पर पेड़ हैं। भारतीय वन नीति 1988 व हरियाणा सरकार वन नीति 2006 के अनुसार कुल भू-भाग के 33 प्रतिशत पर जंगल होना चाहिए। वन क्षेत्र कम होने पर पर्यावरण प्रेमियों ने चिंता जाहिर की है। रेवाड़ी में वन आवरण क्षेत्र (फोरेस्ट कवर एरिया) में कुछ हद तक बढ़ोतरी हुई है। आकड़ों के अनुसार रेवाड़ी के कुल भौगोलिक क्षेत्र 1594 वर्ग किलोमीटर में 3.96% वन आवरण क्षेत्र है। इंडिया स्टेट ऑफ फॉरेस्ट की रिपोर्ट के अनुसार एक दशक के दौरान करीब दस वर्ग किलोमीटर वन क्षेत्र बढ़ा है। रिपोर्ट में यह बढ़कर 63 वर्ग किलोमीटर हो गया। झाबुआ, नाहड़ फॉरेस्ट के साथ ही अरावली क्षेत्र से जिले में वन क्षेत्र को बढ़ावा मिल रहा है। निकट भविष्य में अरावली की सुरक्षा मजबूत होने से वन क्षेत्र को फायदा मिला है। हालांकि, जितना भी वन क्षेत्र बढ़ा है, फिर भी यह कम है। इसे बढ़ाने के लिए लगातार वन विभाग की तरफ से पौधारोपण अभियान भी चलाया जा रहा है। इधर, गर्मियों में तापमान तो 47 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच जाता है। प्रदूषण का स्तर 450 के करीब पहुंच गया था। संवाद
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कृषि वानिकी पर जोर देना आवश्यक : कमल

राष्ट्रीय पर्यावरण प्रकृति संरक्षण एवं संवर्धन संस्था के राष्ट्रीय संयोजक कमल सिंह यादव ने बताया कि वन विभाग व सरकारी संस्थान के पौधारोपण से भारत सरकार व हरियाणा सरकार की वन नीति के अनुसार लक्ष्य प्राप्त करना असंभव है। वन क्षेत्र को बढ़ाने के लिए कृषि वानिकी पर जोर देना आवश्यक है। कृषि वानिकी सेवा के तहत की गई पौधारोपण को बचाना व बढ़ाना जरूरी है। पानी के अभाव में सफेदा पॉपुलर, मालाबार नीम, बैकेन, शहतूत के पेड़ कामयाब नहीं हो पाते। इलाके में जो पेड़ यहां के वातावरण के अनुरूप हैं, वह दीर्घायु के पेड़ हैं, जिन्हें विकसित होने में कम से कम 30-40 वर्ष का समय लग जाता है। इनमें खेजड़ी, जाल, रोहेड़ा, फ्रांस, लेहसुआ, धोंक, रोझ, खैरी, बेरी इन्दरजौ इत्यादि शामिल है। इन प्रजातियों के वृक्षों को बचाना बहुत जरूरी है। रेवाड़ी, महेन्द्रगढ़, दादरी, भिवानी, कुछ भाग झज्जर व गुरुग्राम जिलों में लगभग 5-6 लाख स्थानीय प्रजातियों के वृक्ष खड़े हैं। स्थानीय प्रजातियों के लिए विशेष किसान वृक्ष प्रोत्साहन योजना लागू की जाए।

क्या कहती है हरियाणा वन नीति

हरियाणा सरकार ने वन क्षेत्र बढ़ाने के लिए राज्य वन नीति 2006 घोषित की थी। इसमें हरियाली को दस प्रतिशत तक ले जाने का लक्ष्य था, लेकिन जिले में अभी तक हरियाली सात प्रतिशत तक भी नहीं पहुंच पाई है। जबकि सरकार ने लक्ष्य निर्धारित किया था कि वर्ष 2010 तक दस प्रतिशत एवं अगले कुछ वर्षों के भीतर लक्ष्य 20 प्रतिशत तक पहुंचाना है। जबकि राष्ट्रीय वन नीति के तहत वन क्षेत्र 33 प्रतिशत तक होना चाहिए।
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क्या कहते हैं पर्यावरणविद

पर्यावरणविद डाॅ. बलबीर शर्मा ने बताया कि वन विभाग को चाहिए कि वह अन्य पौधों की बजाय बड़े व फलदार पाैधों काे ही रोपित करें। उनके अनुसार जनसंख्या के अनुपात में बड़े व फलदार पेड़ों की जरूरत है। आज तापमान व प्रदूषण बढ़ने का मुख्य कारण तालाबों के साथ साथ बड़े पेड़ों में कमी होती जा रही है। आज शहर के सभी तालाब खत्म हो गए हैं। कहीं कहीं बड़ा पेड़ नजर आता है। प्रदूषण व तापमान में कमी लाने में मुख्य बड़, पीपल, जाल, कैंदू व फलदार पेड़ होते हैं लेकिन शहर में ही नहीं गांवों में भी इनकी काफी कमी है।
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