केंद्र सरकार की ओर से चलाए जा रहे जननी-शिशु सुरक्षा कार्यक्रम को सरकारी व्यवस्था की पलीता लगा रही है। रविवार को एक प्रसूता अपने तीन दिन के नवजात के साथ अस्पताल के गेट पर एंबुलेंस का पांच घंटे तक इंतजार करती रही, लेकिन एंबुलेंस नहीं आई। महज बीस कदम दूरी पर खड़ी एंबुलेंस को ऑपरेटर ने यह कहकर मना कर दिया कि यह केवल इमरजेंसी सेवा के लिए है। प्रसूता के गांव में जब इस बात का पता लगा तो ग्रामीण पैसे एकत्रित कर उसे निजी वाहन से घर लेकर गए।
यह है पूरा मामला...
गांव राजपुरा निवासी माया देवी ने नौ सितंबर को शहर के नागरिक अस्पताल में एक बच्चे को जन्म दिया था। रविवार को माया देवी को अस्पताल से छुट्टी मिल गई। माया देवी के पति बस्तीराम मजदूरी कर अपने परिवार की गुजर-बसर करते हैं। घर जाने के लिए बस्तीराम ने 102 पर कॉल किया, लेकिन यहां से कोई एंबुलेंस उपलब्ध नहीं होने का जवाब मिला। इसके बाद बस्तीराम ने अस्पताल के अंदर ही बने कॉल सेंटर पर बैठे ऑपरेटर से चलने के लिए कहा। वहां से यह एंबुलेंस केवल इमरजेंसी सेवा के लिए होना बताया गया। सुबह नौ से दोपहर दो बजे प्रसूता अपने नवजात बच्चे के साथ एंबुलेंस का इंतजार करती रही।
शिकायत के बाद भी नहीं मिली एंबुलेंस
काफी देर तक भी एंबुलेंस का कोई इंतजाम नहीं हुआ तो किसी व्यक्ति बस्तीराम को जिला विधिक प्राधिकरण रेवाड़ी को शिकायत करने की सलाह दी। ब स्तीराम की शिकायत के बाद लीगल एड काउंसिल के कैलाश चंद एवं रणवीर सिंह मौके पर पहुंचे। दोनों के प्रयासों के बावजूद भी प्रसूता को एंबुलेंस उपलब्ध नहीं कराई जा सकी। कैलाश चंद ने बताया कि पहले भी कई बार इस तरह की घटनाएं सामने आ चुकी हैं। वह स्वास्थ्य विभाग के खिलाफ कानूनी कार्रवाई करेंगे।
फ्री ट्रांसपोर्ट का दावा केवल विभाग की वेबसाइट पर
जननी-शिशु सुरक्षा कार्यक्रम के तहत केंद्र सरकार ने सरकारी अस्पतालों में जीरो खर्चे से योजना चलाई थी। इसके तहत हरियाणा सरकार ने भी एक जून 2011 को मेवात से शुरू किया था। योजना के तहत गर्भवती महिला की डिलीवरी पर होने वाले सारा खर्चे को सरकार वहन करेगी। इसी के साथ गर्भवती को घर से लाने एवं डिलीवरी के बाद वापस घर तक छोड़ने की फ्री में व्यवस्था की गई थी। इसके लिए सरकार की ओर से उपलब्ध एंबुलेंस के अतिरिक्त जननी सुरक्षा के नाम से दो एंबुलेंस की व्यवस्था की गई थी। गौरतलब है कि इन सभी के लिए केंद्र सरकार राष्ट्रीय हेल्थ मिशन के तहत प्रदेश सरकारों को धन मुहैया कराती है। लेकिन सरकार के दावे केवल विभाग की वेबसाइट तक ही सिमट कर रह गए हैं।
बीमार है जिले की एंबुलेंस सेवा
जच्चा-बच्चा को ट्रांसपोर्ट की व्यवस्था से दो-चार होने का यह पहला मामला नहीं है। इससे पहले भी कई बार ऐसे मामले सामने आ चुके हैं। बावजूद इसके स्थिति सुधरने की बजाय बिगड़ती जा रही है। नेशनल हेल्थ मिशन से करोड़ों रुपये की राशि मिलने के बावजूद भी अस्पताल के अधिकारी एंबुलेंस सेवा को पटरी पर नही ला सके हैं। आलम यह है कि एनएचएम के तहत दो जननी सुरक्षा एंबुलेंस में से एक कंडम हो चुकी हैं। वहीं दूसरी एंबुलेंस का पांच घंटे से भी अधिक समय तक वहां नहीं पहुंची। जिले में दस एंबुलेंस सड़क पर दौड़ रही हैं। इनमें से भी आठ एंबुलेंस जिले की सीएचसी एवं पीएचसी के पास हैं। ऐसे में नागरिक अस्पताल के पास के केवल दो एंबुलेंस बच जाती हैं।
----------------
वर्जन
नियम के अनुसार प्रसूता को घर पर छोड़ने की व्यवस्था है। लेकिन एंबुलेंस की कमी से इस तरह के हालात हो जाते हैं। एक एंबुलेंस को आपात स्थिति के लिए रखना जरूरी होता है। प्रसूता को घर छोड़ना इमरजेंसी नहीं है। विभाग को अतिरिक्त एंबुलेंस के लिए लिखा हुआ है।
-डॉ. लाल सिंह, नोडल अधिकारी, एनएचएम
------------