मास्टर नेकीराम की परंपरा को उनके पिता मास्टर मूलचंद और पुत्र मास्टर राजेंद्र सिंह ने आगे बढ़ाया। इस प्रकार तीन पीढ़ियों ने 100 वर्षों से अधिक समय तक निरंतर हरियाणवी लोक संस्कृति को जीवित रखा है। उनके शिष्यों में नानकचंद भगत और मेहरचंद लाखनौर जैसे प्रसिद्ध लोक कलाकार शामिल रहे।
10 जून 1996 को उनके निधन के बाद भी उनकी विरासत जीवित है। आज उनके शिष्य और लोकगायक इस परंपरा को आगे बढ़ा रहे हैं। स्थानीय स्तर पर उनके सम्मान में सड़क का नामकरण भी किया जा चुका है। वहीं सांस्कृतिक संगठनों की ओर से उनके नाम पर पुरस्कार और संस्थान स्थापित करने की मांग उठ रही है।
समाज को जोड़ने और दिशा देने का सशक्त माध्यम
मास्टर नेकीराम के पोते आलोक भांडोरिया ने बताया कि विश्व कला दिवस पर मास्टर नेकीराम का जीवन और योगदान इस बात का प्रमाण है कि लोक कला केवल मनोरंजन नहीं बल्कि समाज को जोड़ने और दिशा देने का सशक्त माध्यम भी है। 6 अक्तूबर 1915 को संगीताचार्य मास्टर मूलचंद और लाडो देवी के घर जन्मे नेकीराम ने बचपन से ही सांग कला को अपनाया। उन्होंने अपने गुरु महाराज गोपाल नाथ के मार्गदर्शन में इस लोकनाट्य परंपरा को समृद्ध किया। उनकी कला का प्रभाव केवल हरियाणा तक सीमित नहीं रहा बल्कि अहीरवाल और राजस्थान के दूर-दराज क्षेत्रों तक फैला। आज भी उन्हें एक महान सांग सम्राट के रूप में सम्मानपूर्वक याद किया जाता है।
हजारों लोक रचनाएं और तीन दर्जन से अधिक सांगों की रचना की
मास्टर नेकीराम ने हजारों लोक रचनाएं और तीन दर्जन से अधिक सांगों की रचना की। करीब 60 वर्षों तक उन्होंने निरंतर मंचन कर इस कला को जीवित रखा। उनकी सबसे बड़ी विशेषता यह थी कि जैसे-जैसे रात गहराती, उनकी आवाज और प्रस्तुति में और निखार आता था। उनके सांग सात-आठ घंटे तक लगातार चलते थे और पूरा परिवार एक साथ बैठकर उन्हें देख सकता था। उनका योगदान केवल कला तक सीमित नहीं रहा। उन्होंने अपने सांगों के माध्यम से मंदिर, कुएं, धर्मशालाएं, स्कूल और तालाब बनवाने जैसे जनहित कार्य भी करवाए। गरीब कन्याओं के विवाह और जरूरतमंदों की सहायता कर उन्होंने मानवता की मिसाल पेश की। स्वतंत्रता संग्राम के दौरान भी उन्होंने जनजागृति में अहम भूमिका निभाई।
अहीरवाल क्षेत्र के किसी भी लोक कवि को नहीं मिला पुरस्कार
मास्टर नेकीराम के पोते आलोक भांडोरिया ने बताया कि मास्टर नेकीराम की स्मृति में पहले की तरह निरंतर कार्यक्रम नहीं हो पा रहे हैं। कार्यक्रम अगर होता है तो वो भी सरकारी अनुदान पर हो पाते हैं, अगर अनुदान कम मिलता है तो कार्यक्रम कम हो पाते हैं। सरकार से मांग है कि अन्य लोक कवियों की भांति मास्टर नेकीराम के नाम पर प्रदेश स्तरीय साहित्य पुरस्कार की स्थापना होनी चाहिए। अहीरवाल क्षेत्र से किसी भी लोक कवि के नाम से कोई पुरस्कार नहीं है। पिछले दिनों संतोषजनक परिणाम ये हुआ कि आईजीयू में नेकीराम के नाम पर एक चेयर स्थापित की गई है। देखना होगा कि ये चेयर भविष्य में लोक साहित्य पर कितना कार्य कर पाती है। सांग कार्यक्रम को जीवित रखने के लिए सांग सम्राट मास्टर नेकीराम साहित्य कला मंच इस पर कार्य रही है। इसके अलावा मास्टर नेकीराम साहित्य एवम लोकनाटक कला संरक्षण परिषद भी कार्य करती है। लोकगायन, सांग मंचन कवि सम्मेलन होते हैं।
9 जनवरी 1971 में नांगल चौधरी कार्यक्रम में पस्तुति देते मास्टर नेकीराम। स्रोत : परिवार