संवाद न्यूज एजेंसी
रेवाड़ी। रोडवेज की ओर से दो कंपनियों पर खराब डीजल आपूर्ति करने के मामले में अब फ्यूल कंपनी ने रोडवेज के जीएम पर कई सवाल उठाए हैं। फ्यूल कंपनी ने रोडवेज जीएम की ओर से दी गई एफआईआर को जांच के बाद रद्द करने के कारण भी गिनाए हैं। आर्थिक अपराध शाखा ने मामले की जांच की थी जिसमें खुद रोडवेज के जीएम खुद अनियमितता में फंस गए हैं।
रेवाड़ी रोडवेज डिपो की ओर से मार्च में दो तेल कंपनियों फ्यूल विंग और श्री तीर्थ स्वामी पर खराब डीजल आपूर्ति करने के आरोप लगाए थे। रोडवेज के महाप्रबंधक देवदत ने इस मामले में एफआईआर दर्ज कराई थी। उन्होंने शिकायत में कहा था कि 12 फरवरी से डीजल की आपूर्ति लगातार चली आ रही थी। जब बसों को मार्ग पर भेजा गया तो बीएस-6 बसों से धुआं आने और रास्ते में ही ब्रेकअप की समस्याएं पैदा होने लगी। जब बसों को संबंधित एजेंसी में दिखाया गया तो बताया गया कि बसें सही हैं। उसमें डाले गए डीजल में कमी है। मामले की जांच आर्थिक अपराध शाखा ने की तो तमाम अनियमिता सामने आई जिसमें जीएम खुद फंसे नजर आए।
अब फ्यूल विंग के मैनेजर साहिल यादव ने रोडवेज जीएम की ओर से दी गई एफआईआर रद्द होने के कारण गिनाए हैं। उनका कहना है कि रोडवेज रेवाड़ी ने 27 फरवरी 2024 का फ्यूल विंग्स का एक महीने पुराना नमूना 28 मार्च 2024 को प्रस्तुत किया, जोकि पेट्रोलियम दिशानिर्देशों के खिलाफ था। हाई स्पीड डीजल (एचएसडी) के नमूने 27 फरवरी को सील नहीं किए गए थे और इन्हें 28 मार्च तक बिसलरी की बोतल में खुले में रखा गया। आईओसीएल अधिकारी ने 18 मार्च को इसी नमूने को खारिज कर दिया था, लेकिन 6 अप्रैल को संशोधित नमूने को स्वीकार कर लिया गया। आईओसीएल अधिकारी ने मेन कॉपी प्रस्तुत की जिसमें नमूना लेबल बदलने के प्रमाण मिले। शुरुआत में आईओसीएल अधिकारी ने रिपोर्ट को लेटर हेड पर साझा किया, जोकि रिपोर्ट साझा करने के नियमों के खिलाफ था बाद में जब मामला दर्ज किया गया, तब असली रिपोर्ट साझा की गई।
यह भी बताया कि 12 से 16 मार्च के बीच हरियाणा रोडवेज टैंक में 4000 लीटर अतिरिक्त एचएसडी पाया गया। ये वही तारीखें हैं जब बसों के मुद्दे उठाए गए थे, जबकि फ्यूल विंग्स की आपूर्ति 12 मार्च को रोक दी गई थी। इसलिए टैंक में मिला ईंधन फ्यूल विंग्स द्वारा नहीं दिया गया था। पेट्रोलियम दिशानिर्देशों के अनुसार 3 नमूने लिए जाने चाहिए और उनमें से एक नमूना सप्लायर को, दूसरा परीक्षण के लिए, और तीसरा विवाद के समय पुनः परीक्षण के लिए भेजा जाना चाहिए, लेकिन यहां केवल पानी की बोतल में एक ही नमूना लिया गया, जबकि इसे सिल्वर बॉटल के सैंपल किट में लिया जाना चाहिए था।
जांच में चालकों के प्रशिक्षण में पाई गई कमी
जांच में बस चालकों के प्रशिक्षण में कमी पाई गई। उन्हें यह नहीं पता था कि प्यूरीफायर को साफ करने के लिए बटन का उपयोग कैसे किया जाए, जिससे बसें बीच में ही रुक गईं। वहीं, मामले में रोडवेज ने दावा किया कि अशोक लीलैंड ने अपने निजी परीक्षण में एचएसडी की खराब गुणवत्ता की रिपोर्ट दी थी, लेकिन यह तथ्य गलत है क्योंकि अशोक लीलैंड की रिपोर्ट में यूरिया की खराब गुणवत्ता की बात कही गई थी। इसके अलावा रोडवेज ने लिखित रूप में स्वीकार किया कि अशोक लीलैंड को भेजी गई बसों का ईंधन निकाल लिया गया था। इस स्थिति में सवाल उठता है कि जब उन बसों से ईंधन निकाल लिया गया था तो अशोक लीलैंड ने बिना सप्लायर और रोडवेज को सूचित किए किस ईंधन का परीक्षण किया।
आपूर्ति किया गया डीजल खराब था तो झज्जर बहादुरगढ़ क्यों भेजा
फ्यूल विंग्स का कहना है कि यदि आपूर्ति किया गया डीजल खराब गुणवत्ता का था, तो जब हरियाणा रोडवेज ने जब इस मुद्दे को उठाया, उस समय उनके ग्राउंड टैंक में न्यूनतम 50 हजार लीटर खराब डीजल होना चाहिए था। सवाल उठता है कि ग्राउंड टैंक का सैंपल क्यों नहीं लिया गया और वह खराब गुणवत्ता वाला डीजल कहां गया। उसी डीजल को झज्जर रोडवेज ने उपयोग किया और उसी डीजल को झज्जर स्थानांतरित कर दिया, जहां कोई शिकायत नहीं की गई। यदि डीजल की गुणवत्ता वाकई खराब थी, तो झज्जर, बहादुरगढ़ में भी शिकायतें दर्ज होनी चाहिए थीं, लेकिन ऐसा नहीं हुआ।