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39 स्वतंत्रता सेनानियों के लुखी गांव को अभी भी अनदेखी से आजादी मिलने का इंतजार

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प्रदेश में जब स्वतंत्रता सेनानियों का जिक्र आता है तो जिले के गांव लुखी को सबसे पहले याद किया जाता है। स्वतंत्रता सेनानियों के बलिदान के बाद भी लुखी गांव विकास की बाट जोह रहा है। स्वतंत्रता सेनानियों को वर्षभर में केवल 15 अगस्त व 26 जनवरी जनवरी को याद किया जाता है। सबसे अधिक स्वतंत्रता सेनानी देने वाले परिवारों के बारे में व गांव लुखी के बारे में ध्यान ही नहीं दिया गया। बदहाली का आलम यह है कि स्वतंत्रता सेनानियों की याद में बनवाए गए पार्क तक की सुध नहीं ली जा रही है। गांव में स्वास्थ्य सेवाओं से लेकर गलियां तक बदहाल हैं।
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गांव में पशु अस्पताल से लेकर पीएचसी तक नहीं होने से लोगों को परेशानियों से दो-चार होना पड़ रहा है। 6 वर्ष पूर्व मुख्यमंत्री ने पशु अस्पताल शुरू करने की घोषणा की थी। लेकिन अब तक यह सुविधा लोगों को नहीं मिली है। ग्रामीणों का कहना है कि 46 लोगों ने स्वतंत्रता आंदोलन में भाग लिया था, लेकिन गांव में लगे पत्थर पर 39 लोगों के नाम अंकित हैं।
वाटर सप्लाई का पानी नहीं पीने योग्य
पूर्व मंत्री की घोषणा के बाद भी गांव में पेयजल के लिए बनाई वाटर सप्लाई में पीने योग्य पानी नहीं मिल रहा है। गांव की अधिकांश फिरनी कच्ची हैं। शिक्षा की अलख जगाने वाले पंडित सोहनलाल आर्य जिसने बेटियों की शिक्षा पर पूर्ण बल दिया और बेटियों को पढ़ाना शुरू किया, लेकिन आज गांव में बेटियों की शिक्षा के लिए भी कुछ विशेष नहीं है।
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एक दर्जन स्वतंत्रता सेनानियों को हुई थी दो वर्ष की जेल
वर्ष 1938-39 में देश की आजादी के लिए आंदोलन में भाग लेने के लिए गांव लुखी के करीब एक दर्जन ग्रामीण हैदराबाद के लिए रवाना हो गए। गांववासियों ने मान लिया था कि वे जिंदा लौटकर नहीं आएंगे। हैदराबाद में इन ग्रामीणों को गिरफ्तार कर लिया गया तथा दो-दो साल की सजा हो गई। दो माह बाद ही हैदराबाद के राजा निजाम ने अपने जन्मदिन पर इन्हें रिहा कर दिया। जब ये ग्रामीण अपने घर लौटे तो उनका भव्य स्वागत हुआ। इसके बाद इस गांव में देशभक्ति की ऐसी लहर दौड़ी कि गांव का हर ग्रामीण जहां आंदोलन हुआ, बढ़-चढक़र भाग लेने लगे।
नेताजी की याद में बना सुभाष पार्क हुआ बदहाल
नेताजी सुभाष चंद्र बोस की याद में बनवाया सुभाष पार्क बदहाल हो चुका है। सतीश प्रधान, मास्टर महाबीर, चंद्र सिंह, सुरेन्द्र आर्चाय ने बताया कि लुखी गांव राज्य का पहला गांव बन गया जहां सबसे ज्यादा स्वतंत्रता सेनानी हुए। 15 अगस्त व 26 जनवरी को समारोह में यहां के स्वतंत्रता सेनानियों तथा उनके परिजनों को सम्मान दिया जाता है। स्वतंत्रता सेनानियों की स्मृति में स्वतंत्रता सेनानियों ने चंदा एकत्रित करके गांव की एक कनाल पंचायत भूमि पर गत 24 दिसंबर 1998 को स्वतंत्रता सेनानियों ने नेताजी सुभाषचंद्र बोस का स्मारक बनाया हुआ है जिस पर गांव के सभी स्वतंत्रता सेनानियों के नाम अंकित है। आजाद हिंद फौज के जवान स्व. रामजीलाल यादव ने इस पार्क में नेताजी सुभाषचंद्र बोस की प्रतिमा स्थापित करवाई थी।
ये रहे स्वतंत्रता संघर्ष संग्राम के सिपाही
गांव के रामजीलाल आजाद, जगमाल, भूपसिंह, उमराव सिंह, तुलाराम, चंदगीराम, रामजीलाल, जगराम, हरिराम, हरद्वारीलाल, सोहनलाल, तोखराम, चुन्नीलाल, रूपराम, भीमसेन, यशपाल, लाजपतराय, माड़ूराम, हरद्वारीलाल, धर्मचंद, खेमराम, धर्मेंद्र, देवदत्त, धर्मचंद, सुल्तान सिंह, मनोहरलाल, बिखरन, जयपाल, डीगराम, रगबीर सिंह, रामसिंह, चिरंजीलाल, दीनदयाल, अमरसिंह, धुरेंद्र सिंह, सुल्तानसिंह, बदलुराम, बोहतराम, यादवेंद्र, अमरसिंह, भगवान सिंह, गोपाल, रतिराम, सोहनलाल, भानाराम, मुरलीराम, शिवलाल ने स्वतंत्रता संघर्ष में देश की आजादी के लिए आजाद हिंद फौज में शामिल होकर नेताजी का सहयोग किया था।
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