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दो दिन पूर्व तेज अंधड़ से आशियाने टूटे हैं, किसानों के हौसले नहीं : गुरनाम सिंह चढूनी

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दो दिन पूर्व तेज अंधड़ से आसियाने टूटे हैं, किसानों के हौसले नहीं : गुरनाम सिंह चढूनी
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- कहा-तेज बारिश व अंधड़ में भी खुले आसमान के नीचे रहे किसान, लेकिन केंद्र सरकार पीछे नहीं हटना चाहती
संवाद न्यूज एजेंसी
रेवाड़ी। कृषि कानूनों के विरोध में दिल्ली-जयपुर हाईवे स्थित खेड़ा बॉर्डर पर किसानों का धरना 169वें दिन भी जारी रहा। सोमवार को किसान नेता गुरनाम सिंह चढूनी भी धरनास्थल पर पहुंचे और दो दिन पूर्व तेज अंधड़ से हुए नुकसान का जायजा लिया।
उन्होंने कहा कि देश का किसान कृषि कानूनों को वापस कराने के लिए तेज बारिश व अंधड़ में खुले आसमान के नीचे पड़ा है, लेकिन जिद्दी केंद्र सरकार तीनों कानूनों को वापस लेने के लिए पीछे नहीं हटना चाहती है। अंधड़ और बारिश से भले ही किसानों के आसियाने टूट गए लेकिन उनके हौसले नहीं टूटे हैं। वहीं धरना स्थल पर किसानों की समूह चर्चाओं का दौर जारी रहा।
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उन्होंने कहा कि किसान आंदोलन को छह माह पूरे हो गए हैं। आंदोलन की गूंज देश-विदेश तक पहुंच चुकी है। सरकार के साथ 11 दौर की बेनतीजा बैठकें भी हुईं, मगर बात नहीं बनी। सुप्रीम कोर्ट का दखल भी हुआ, कमेटी बनी, लेकिन अभी तक देश का अन्नदाता सड़कों पर है। आंदोलन के दौरान सैकड़ों की संख्या में किसान अपनी शहादत दे चुके हैं। किसान अभी भी डटा हुआ है और मजबूत इरादों के साथ वो फैसला कर चुका है कि जब तक तीनों कृषि कानून और बिजली संशोधक विधेयक 2020 रद्द नहीं होंगे और एमएसपी पर गारंटी का कानून नहीं बनेगा तब तक वे एक कदम भी पीछे नहीं हटेंगे।
उन्होंने कहा कि किसान आंदोलन अब देश का सबसे बड़ा आंदोलन बन चुका है। सत्ताधारी पार्टी के भी कुछ पदाधिकारी और मंत्रियों को भी ये लगने लगा है कि किसानों की बात समय रहते सुन ली जाए। अन्यथा साठ करोड़ किसान उनके परिवार के सदस्य, रिश्तेदार और जानकार, ये आंकड़ा 2024 के लोकसभा चुनाव में बहुत बड़ा हो जाएगा।
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वहीं खेड़ा बॉर्डर पर समूह चर्चा करते हुए किसानों ने कहा कि मोदी सरकार की मंशा किसानों को उजाड़ कर सिर्फ कॉरपोरेट घरानों का खजाने भरने की है। नए कृषि कानूनों से प्राइवेट मंडियां स्थापित होंगी और इसके चलते सरकारी मंडियां बंद हो जाएंगी। नतीजा, सरकारी खरीद समाप्त होगी। लाखों नौकरियां देने वाले रेलवे, एयरपोर्ट, बैंक, बीमा, बीएसएनएल, बीपीएल व कोयला खानें आदि देश की आम जनता के धन से बने उद्योगों, कंपनियों तथा उद्यमों को कौड़ियों के मूल्य पर कॉरपोरेट घरानों के हाथों में बेचा जा रहा है।
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