जिले में समेकित बाल विकास सेवाओं पर लगभग पांच करोड़ सालाना खर्च करने के बाद भी आठ हजार से ज्यादा बच्चे कुपोषण का शिकार हैं।
वहीं 229 नौनिहाल अति कुपोषण का जीवन जीने को मजबूर है। इसका खुलासा महिला एवं बाल विकास विभाग की ओर से अक्टूबर तक आंगनबाड़ियों से जुटाई रिपोर्ट में हुआ है। रिपोर्ट के मुताबिक जिले में कुल 78,571 बच्चे आंगनबाड़ियों से जुड़े हैं। इनमें 7991 कुपोषित और 229 अतिकुपोषित बच्चे हैं।
हरियाणा और खासकर अहीरवाल में भले ही दूध-दही का खाना वाली कहावत चलती हो लेकिन रेवाड़ी जिले की हकीकत इससे जुदा है।
हरियाणा सरकार भी बच्चों को हृष्ट पुष्ट रखने के लिए अनेक योजनाएं चलाए हुए है, लेकिन धरातल पर यह योजनाएं कितनी कारगर साबित हो रही है, इसका सच यहां के बच्चों की शारीरिक स्थिति से सामने आ रहा है। आंकड़ों के अनुसार हालात इससे भी बद्तर है।
क्योंकि अक्टूबर महीने में ही जिले में इनफेंट डैथ की संख्या 22 केे पार थी। यहां यह बताना जरूरी है कि जिले में बच्चों के पैदा होने के समय से लेकर छह साल तक बच्चों को कुपोषण से बचाने के लिए 1099 आंगनबाड़ी केंद्र कार्य कर रहे हैं।
जिले के गांव भटेड़ी, आलियावास, बासगांव, बुडौली व रोलियावास सहित लगभग 250 गांवों को कुपोषण के लिए संवेदनशील माना गया है। ऐसे में सवाल यह उठता है कि सरकार की ओर से जारी होने वाली करोड़ों रुपये की ग्रांट का उपयोग किस स्तर पर हो रहा है।
क्या है कुपोषण का मापक
जो बच्चे जन्म के समय दो किलो से कम रह जाते हैं, उनको बाल एवं महिला विकास की ओर अति कुपोषित, ढाई किलो से कम रहने पर कुपोषित व ढाई किलो से ज्यादा रहने पर बच्चो को नार्मल माना जाता है। वहीं जैसे-जैसे नौनिहालों की आयु बढ़ती है, उसी हिसाब से मानक भी बदलता जाता है। विभाग की ओर से नार्मल के लिए ग्रीन, अति कुपोषित के लिए लाल व कुपोषित के लिए पीला कलर प्रयोग में लाया जाता है।
कुपोषण पर लगाम के लिए डेढ़ रुपये
किसी भी बच्चे को कुपोषण से बचाने के लिए उसे प्रतिदिन 300 किलो कैलोरी के साथ-साथ आठ से दस ग्राम प्रोटीन की आवश्यकता होती है। समेकित बाल विकास सेवा के तहत विभाग की ओर से आंकड़ों में इसी स्कीम को अपनाना होता है। कुपोषण पर लगाम लगाने के लिए विभाग की ओर से गर्भवती महिलाओं के लिए प्रतिदिन 2.50 रुपये, छह महीने से लेकर छह साल तक नौनिहाल पर 1.43 रुपये व अतिकुपोषित बच्चे के लिए 2.86 पैसे खर्च किये जाते हैं।
बजट छह करोड़ लेकिन नहीं रुक पाई इनफैंट डैथ
समेकित बावल विकास सेवा व सबला स्कीम जोड़ दिया जाए तो नौनिहालों के कुपोषण को रोकने के लिए सरकार प्रतिवर्ष लगभग छह करोड़ रुपये बहा रही है। तमाम कोशिशों के बावजूद सरकार जनवरी से लेकर अब तक 229 इंफैंट डैथ की संख्या पर लगाम नहीं लगा पाई है। इंफैंट डैथ उसको कहते जब जन्म से लेकर एक साल तक बच्चे की मौत हो जाती है। हम यहां यह बताते दे कि बच्चों को सभी बिमारियों के साथ कुपोषण से बचाने के लिए गर्भ के समय से ही कैलोरी व प्रोटीन का ध्यान रखा जाता है, लेकिन आंकड़े सभी प्रयासों को धत्ता बताने के लिए काफी हैं।
कुपोषण पर लगाम लगाने के लिए क्या हैं योजनाएं
कुपोषण पर लगाम लगाने के लिए केंद्र व प्रदेश सरकारी की ओर से विभिन्न योजनाएं चल रही हैं। महिला के गर्भवती होने के साथ ही जिले की 1099 आंगनवाडिय़ों के माध्यम से सबला स्कीम के माध्यम से टीकाकरण के साथ पोषक तत्वों से युक्त आहार देने का प्रावधान है। वहीं जैसे ही बच्चा छह महीने का होता है तो आंगनवाड़ी के माध्यम से ही विभाग की ओर से पूरक आहार के तहम प्रोटीन व कैलोरी युक्त खाना उपलब्ध कराया जाता है। वहीं सरकार की ओर से 15 दिसंबर तक कुपोषण से संवेदनशील गांवों में स्पेशल अभियान चलाया जा रहा है। वहीं अतिकुपोषित बच्च्चों को डबल डाइट दी जा रही है।
वर्जन
नौनिहालों में कुपोषण को रोकने के लिए सरकार की ओर से विशेष अभियान चलाया गया है। हमने प्रोग्राम को इस तरह डिजाइन किया हुआ है कि कोई बच्चा कुपोषित न रहे।
-संतोष अहलावादी, जिला बाल एंव महिला विकास कार्यक्रम अधिकारी
डॉक्टर से बातचीत
रेवाड़ी। चाइल्ड स्पेशलिस्ट डॉ महिपाल सिंह का कहना है कि बच्चों को कुपोषण से बचाने के लिए अभिभावकों का जागरुक होना जरूरी है। प्रोटीन, दूध, गुड़ जैसी चीजों से कुपोषण पर पार पाया जा सकता है। हरी पत्तीदार सब्जियों के साथ गाजर, मूली आदि बच्चों को देनी चाहिए। प्रोटीन के लिए सबसे बड़ा स्त्रोत दाल है, जो बच्चों को जरूर देनी चाहिए।