स्वास्थ्य विभाग मलेरिया और डेंगू के डंक से निपटने के बड़े-बड़े दावे कर रहा है, लेकिन असलियत कुछ और ही बयां कर रही है। विभाग ने जून माह के बाद अभी तक कहीं भी फॉगिंग तक नहीं करवाई है, ऐसे में बृहस्पतिवार रात हुई बरसात के बाद फिर से इन बीमारियों का डंक लोगों को डंस सकता है। जबकि जिले में नाहड़ जैसे र्कई संवेदनशील क्षेत्र हैं।
पिछले वर्ष जिले में मलेरिया के 53 मरीज आए थे और डेंगू के 30 सस्पेक्टिड और 5 कन्फर्म केस सामने आए थे। इस बार भी अब तक मलेरिया के 6 मरीज सामने आ चुके हैं। स्वास्थ्य विभाग की ओर से जून माह में सर्कुलर रोड के आसपास फॉगिंग करवाई गई थी। उसके बाद से इस संदर्भ में कोई भी कारगार कदम नहीं उठाया गया है। हालांकि विभाग मलेरिया और डेंगू से निपटने के दावे कर रहा है।
स्वास्थ्य विभाग के अनुसार मलेरिया बीमारी सामान्य तौर पर अप्रैल माह में आरंभ होती है और बरसाती दिनों में इसका फैलाव ज्यादा होता है। बारिश के मौसम में घरों के आसपास जलभराव हो जाता है, जिससे यह बीमारी को बढ़ावा मिलता है। स्वास्थ्य विभाग की ओर से जहां भी इस बीमारी के मरीज मिलते हैं, वहां के आसपास के पचास घरों में फागिंग कराई जाती है। ताकि अन्य जगह यह बीमारी नहीं फैले। यह बीमारी मच्छरों के कारण फैलती है। जिले मेें नाहड़ क्षेत्र में मलेरिया का प्रकोप ज्यादा रहता है। यहां चिकनी मिट्टी के कारण जलभराव काफी दिन तक रहता है।
कम संसाधन स्टाफ भी पूरा नहीं
मलेरिया की रोकथाम के लिए स्वास्थ्य विभाग के पास 8 फॉगिंग मशीनें हैं। सिर्फ इन आठ मशीनों पर ही पूरे जिले में शहर और गांवों में फॉगिंग का कार्य निर्भर है। जबकि बावल और धारूहेड़ा जैसे औद्योगिक क्षेत्रों में तो और भी संसाधनों की आवश्यकता है। इस समय जिले में मल्टीपर्पज सोशल वर्कर के 121 पद स्वीकृत हैं, इनमें से 72 पद ही भरे हुए हैं। 24 पद मल्टीपर्पज हेल्थ सुपरवाइजर के स्वीकृत हैं, जो सभी पद भरे हुए हैं।
अब तक कितनी बार हुई फागिंग
स्वास्थ्य विभाग ने जून माह में हुई बारिश के बाद सर्कुलर रोड और आसपास की कुछ कॉलोनियों में फॉगिंग का कार्य किया था। उसके बाद फॉगिंग पर ब्रेक लग गया। विभाग दावा कर रहा है कि अब फिर से बारिश के शुरू होने पर शहर और गांवों में भी फॉगिंग कराई जाएगी। जहां पिछले वर्ष मरीज मिले थे, वहां भी फॉगिंग होगी।
शहर और गांव के संवेदनशील स्थान
स्वास्थ्य विभाग के मुताबिक मलेरिया के रोगी वहां ज्यादा पाए जाते हैं, जहां बरसात या फिर गंदे पानी का भराव होता है। शहर के स्लम इलाके में भी रोगी मिलते हैं। नाहड़ क्षेत्र में हर बार सबसे ज्यादा मरीज मिलते हैं। विभागीय जानकारी के अनुसार वहां की मिट्टी चिकनी है और इस कारण बरसाती पानी का ठहराव ज्यादा दिन तक होता है। ऐसे में उस पानी में मच्छर पनपने से यह बीमारी फैलती है।
डेंगू और मलेरिया के मरीजों का ब्यौरा
जिले में मलेरिया बीमारी के वर्ष 2013 में 53 मरीज आए थे और डेंगू के 30 सस्पेक्टिड मरीज पाए गए थे। 5 डेंगू के कन्फर्म मरीज मिले थे। इस बार वर्ष 2014 में अप्रैल माह में अब तक 6 मरीज सामने आ चुके हैं। इसका प्रकोप आमतौर पर जुलाई-अगस्त माह में ज्यादा होता है।