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आलीशान बंगलों की नीचे दब गई कुम्हार की माटी

Sun, 23 Oct 2016 11:30 PM IST
अमर उजाला ब्यूरो
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मट्टि का बर्तन बनाता कुंभार
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आलीशान बंगलों पर सजी चाइनीज लड़ियां बेशक लोगों के मन को खूब भाती हों, लेकिन इन बंगलों के नीचे भारतीय परंपरा को निभाते आ रहे कुंभकारों की माटी दबी पड़ी है। ढाई से 3 हजार रुपए में चिकनी मिट्टी ट्राली रेत खरीदकर दिए बनाकर कुम्हार मुनाफा नहीं कमा रहा, बल्कि अपनी संस्कृति, रीति-रिवाज को जीवंत रखने का प्रयास कर रहा है। आज से 10-15 पंद्रह वर्ष पहले जहां कुम्हारों को आस-पास की जगह से ही दिए बनाने के लिए चिकनी मिट्टी आसानी से फ्री में उपलब्ध हो जाती थी, वहीं अब इस मिट्टी की मोटी कीमत चुकानी पड़ती है। वहीं इस मिट्टी से तैयार एक 2 रुपए के दीपक को खरीदते समय लोग मोल-भाव भी करना नहीं भूलते।
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दूर-दराज के क्षेत्रों आती है मिट्टी
कुम्हारों की माने तो पहले किसी आस-पास के गांव, जोहड़ या खाली जगह से वे दीपक बनाने के लिए चिकनी मिट्टी खोद लिया करते थे। लेकिन अब उन जगहों पर आलीशान बंगले बन गए हैं, या फिर किसी के गांव या खेत में चिकनी मिट्टी उपलब्ध है, तो वे इसका व्यापार करते हैं। पटौदी के समीप पड़ने वाले लुहारी गांव से अधिकतर कुम्हार इस सीजन में चिकनी मिट्टी मंगवा रहे हैं। यहां के किसान अपने खेतों की चिकनी मिट्टी को महंगे दामों में बेचकर खूब मुनाफा कमा रहे हैं। पहले रेलवे कॉलोनी, कालूवास, सोलाराही आदि जगहों से कुतुबपुर, आजाद नगर, बाला सराय आदि मोहल्लों के कुम्हारों को आसानी से मिट्टी उपलब्ध हो जाती थी।

3 हजार की मिट्टी, 2 रुपए का दीपक
मिट्टी के दीपक बनाने वाले कुंभकार की व्यथा सुनते हैं, तो पता चलता है कि हमारी एक छोटे से दीपक को बनाने में मिट्टी खरीदने से लेकर दीपक भट्टी में तपाने तक कितना बड़ा संघर्ष होता है। तब जाकर कहीं हम अपनी संस्कृति को निभा पाते हैं। समय के साथ चिकनी मिट्टी के स्त्रोत व जगहों के समाप्त होने के साथ कुम्हारों को चिकनी मिट्टी मोल लेनी पड़ रही है। 15 साल पहले जहां 1 पैसे के दीपक में कुम्हार को अच्छी बचत हो जाती थी, वहीं आज एक दीपक 2 से 5 रुपए में बेचने पर भी कुम्हार रत्तीभर मुनाफा नहीं कमा पाता है। वहीं खरीदी हुई मिट्टी में से भी कुम्हार की एक तिहाई मिट्टी वेस्ट हो जाती है।
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शहर में 300 कुंभकार कर रहे काम
वर्तमान में कुंभकार समाज के 300 से अधिक कारीगर शहर की विभिन्न जगहों पर दीपक बनाने का काम कर रहे हैं। मुख्य रूप से मोहल्ला कुतुबपुर, नई आबादी, गोकल बाजार, आजाद नगर, बाला सराय आदि जगहों पर यह काम अधिक है।

100 में 5 दिए हो जाते हैं खराब
दीपक बनाने वाले कारीगर कहते हैं, वे मिट्टी के बर्तन, दीपक, घड़े बनाने का काम केवल उनकी सभ्यता व संस्कृति के लिहाज से करते हैं, अन्यथा इससे उन्हें कोई मुनाफा नहीं है। महंगी मिट्टी खरीदकर काम शुरू करना। एक तिहाई मिट्टी का खराब हो जाना और फिर दीपक तैयार करने के बाद भट्टी में औसतन 100 में 5 दीपकों का खराब हो जाना निश्चित है।  ऐसे में कुम्हार मुनाफा कैसे कमा सकता है। यह तो केवल श्रद्धा है भारतीय संस्कृति के प्रति।

दीपक की चमक नहीं पड़ने देंगे फीकी
समय के साथ मटकों की जगह मयूर जग ने ली तो दीपक की जगह कृत्रिम रोशनी की लड़ियां आ गई। लेकिन इस सब के बावजूद कुंभकार समाज मायूस नहीं हुआ। कुम्हारों की सोच की बात करें तो, उनका यही कहना है कि चिकनी मिट्टी चाहे जितनी महंगी मिले, मेहनत चाहे दोगुनी लगे, लेकिन वे अपनी हस्तकला और भारतीय रीत-रिवाज के अभिन्न अंग दीपक की चमक को कम नहीं होने देंगे। पहले की तुलना में अब यह कारोबार केवल ऑन सीजन का ही रह गया है। अब लोग होली, दीपावली पर ही महज खानापूर्ति के लिए मिट्टी से बने बर्तन खरीदते हैं। लेकिन कुंभकार आज भी उतनी ही शिद्दत से मिट्टी के दीपक को अपनी पेट की आग में पकाकर हमें हमारी संस्कृति लौटाने का काम कर रहे हैं।

चाइनीज लड़ियों के बहिष्कार से आई जागरुकता
कुतुबपुर निवासी कुंभकार भीम सिंह का कहना है कि इस वर्ष लोगों में अपने स्वदेशी दियों को लेकर रुझान बढ़ा है। वरना गत कुछ सालों से लोग महज खानापूर्ति के लिए थोड़े बहुत ही दीपक खरीदते थे। लेकिन इस बार चाइनीज विरोध के बाद लड़ियों से वापस दीपक की रोशनी की ओर लोग बढ़ने लगे हैं। दीपावली पर दीपक खरीदने का 11, 21, 51 का आंकड़ा अब 101, 251 और 501 में बदला है।
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