रेवाड़ी। सामाजिक-आर्थिक जाति जनगणना-2011 के आंकड़ों के आधार पर जिले में आयुष्मान भारत योजना में प्रति परिवार हर साल 5 लाख रुपये तक का स्वास्थ्य बीमा योजना में 45 हजार परिवारों को शामिल किया गया था। केंद्र सरकार की इस योजना को एक साल बीत जाने के बाद भी जिला में 20 हजार लोगों के आयुष्मान कार्ड ही बन सके हैं। इस दौरान 1600 मरीजों ने इस योजना के तहत उपचार कराया है। योजना में अब तक महज 44 फीसदी परिवारों के जुड़ने के पीछे केंद्र सरकार की ओर से जारी लिस्ट में लाभार्थियों के नाम में गलती, सर्वर डाउन व ग्रामीण क्षेत्र में लोगों को योजना का पता तक नहीं होना रहा है। प्रधानमंत्री के नाम से भेजे गए आयुष्मान पत्र भी सभी लाभार्थियों तक नहीं पहुंच पाए। इसके चलते आज भी 25 हजार परिवार आयुष्मान कार्ड से वंचित हैं।
जिले में 100 से अधिक अस्पताल योजना से महज 11 ही जुड़े
23 सितंबर 2018 को नागरिक अस्पताल में योजना का शुभारंभ हुआ था। शुरुआत में योजना से जिला के महज चार अस्पताल ही जुड़े पाए थे। इनमें विराट हॉस्पिटल, एसपी यादव, सिंगला ऑर्थो व कोसली का धीर आई केयर शामिल था। पैनल में शामिल होने के लिए निजी अस्पताल में कम से कम 10 बेड और इसे बढ़ाने की क्षमता होनी चाहिए। इस श्रेणी या इससे अधिक बेड़ के 100 से अधिक अस्पताल जिला में हैं, लेेकिन अभी तक योजना से महज 11 अस्पताल ही जुड़ पाए हैं। कुछ दिनों पहले ही आई क्यू, रिति आई केयर, पुष्पांजलि, आरबी यादव, सिग्नस व दो सरकारी अस्पताल शामिल हुए हैं।
अस्पताल संचालक की योजना से दूरी के कारण:
-उपचार के बाद रिजेक्ट हो रहे क्लेम
योजना से जुड़े अस्पताल संचालकों का कहना है कि माइनर गलती बताकर उपचार के बाद क्लेम के लिए भेजे जा रहे केस को रिजेक्ट कर दिया जाता है। बीते एक माह में 50 से अधिक केस रिजेक्ट होने से अस्पताल संचालक मरीजों को भर्ती करने से बच रहे हैं।
-90 फीसदी केस में 20-30 फीसदी कट रही क्लेम राशि
अस्पताल संचालकों का कहना है कि 90 फीसदी केसों में क्लेम राशि का 20-30 फीसदी काट दिया जाता है। पहले से ही पैकेज के रेट बेहद कम हैं, बाद में राशि काटने से उनके खर्चे तक नहीं निकल पाते हैं, ऐसे में दूूरी बनाना मजबूरी रहता है।
-योजना से जुड़ने में लंबी प्रक्रिया
इंडियन मेडिकल एसोसिएशन (आईएमए) के पूर्व प्रधान डॉ. करतार सिंह ने कहा कि पैकेज के चार्ज बहुत कम रखे गए हैं। पूरी प्रक्रिया ऑनलाइन है। हजार से अधिक कागजी कार्रवाई करनी पड़ती है। प्रक्रिया इतनी लंबी हो जाती है कि अस्पतालों का योजना में जुड़ने से बचना मजबूरी है।
-मरीज नहीं बीमारी का उपचार ये बड़ी तकनीक दिक्कत
अस्पताल संचालकों का कहना है कि योजना का सबसे बड़ा फॉल्ट मरीज नहीं बीमारी का उपचार करना है। चिकित्सकों का कहना है कि कोई व्यक्ति एक बीमारी के लिए आता है। एक पैकेज के तहत उपचार शुरू किया जाता है। उपचार के दौरान दूसरी बीमारी मिलने पर परेशानी खड़ी हो जाती है। उपचार के दौरान दूसरी बीमारी का उपचार किया तो उसका क्लेम नहीं मिलेगा। ऐसे मेें योजना में मरीज नहीं बीमारी का उपचार बड़ी परेशानी बन रही है।
-चौपाल पर चर्चा के माध्यम से जागरूक करने का प्रयास
सभी लाभार्थियों तक योजना के बारे में जानकारी पहुंचाने के लिए विभाग की ओर से सक्षम युवाओं को लगाकर चौपाल पर चर्चा कर करेंगे इलाज का खर्चा कम के तहत जागरूकता अभियान चलाया गया। जागरूकता के तहत 26 को गणतंत्र दिवस पर 40 हजार रुपये खर्च कर एक झांकी निकाली गई। इसके अलावा जागरूकता के लिए अभी तक अतिरिक्त कोई प्रयास नहीं किए गए।
-1354 बीमारियों के पैकेज, बायपास-स्टंट व घुटने तक बदलवा रहे लाभार्थी
आयुष्मान भारत योजना में तकरीबन हर बीमारी के लिए चिकित्सा और अस्पताल में दाखिल होने का खर्च कवर है। इसमें 1354 पैकेज शामिल किये गये हैं। इसमें कोरोनरी बायपास, घुटना बदलना और स्टंट डालने जैसे इलाज शामिल हैं। जिला में स्टंट डलवाने, डायलिसिस, घुटने बदलवाने जैसे बड़े उपचार करवाकर लाभार्थी लाभ उठा रहे हैं।
समस्या की सुनवाई के लिए नहीं प्लेटफॉर्म : डॉ. विराट
रेवाड़ी में इस योजना से सर्वप्रथम जुड़ने वाले विराट हॉस्पिटल के संचालक डॉ विराटवीर यादव ने कहा कि छोटी-छोटी गलतियों पर क्लेम रिजेक्शन किये जा रहे हैं। बीते एक सप्ताह में 17 केस रिजेक्ट कर दिए गए। मरीजों को बीच में छोड़ नहीं सकते, बाद में पैसे मिलते नहीं, ऐसे में समाधान के लिए उनकी सुनवाई के लिए कोई प्लेटफार्म तक नहीं है। हरियाणा में एक डॉ. नियुक्त किए गए हैं। वहां पर लंबे समय तक जवाब का इंतजार करना पड़ता है। ऐसे में डॉक्टर मरीजों को भर्ती करने से बचना मजबूरी बनती जा रही है।
हम सरकार के साथ खड़े हैं, लेकिन समाधान जरुरी : डॉ. यादव
योजना से जुड़ने वाले पहले चार अस्पतालों में से एक डॉ. एसपी यादव ने कहा कि सभी चिकित्सक सरकारी योजनाओं को परवान चढ़ाना चाहते हैं। लेकिन सिस्टम ऐसा होना चाहिए, जहां पर कोई समस्या आने पर समाधान हो सके। सर्जरी के चार्ज पहले से ही कम हैं, उसमें भी कटौती होगी तो कैसे योजना का लाभ दे पाएंगे।
एक साल में दो करोड़ रुपये के दिए क्लेम
आयुष्मान योजना के नोडल अधिकारी डॉ. टीसी तंवर ने कहा कि योजना की सफलता 100 फीसदी है। जितने लोग कार्ड लेकर अस्पताल पहुंचे हैं, सभी को उपचार दिया गया है। क्लेम रिजेक्ट होने के पीछे तकनीकी कारण होते हैं। अभी तक जिला के 11 अस्पताल में क्लेम राशि के रुप में करीब दो करोड़ रुपये दिए जा चुके हैं। योजना के प्रचार-प्रसार के लिए कोई विशेष योजना नहीं है। बीते दिनों सक्षम युवाओं को गांव-गांव भेजकर लोगों को जागरूक करने का प्रयास किया गया था।