रेवाड़ी। करीब आठ साल पुराने विवाहेतर संबंध और धारा 451 के मामले में मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट जोगिंदरी की अदालत ने पलवल निवासी कृष्ण कुमार को आरोपों से बरी कर दिया है। अदालत ने कहा कि अभियोजन पक्ष आरोपों को उचित संदेह से परे साबित करने में विफल रहा। अदालत ने सुप्रीम कोर्ट के जोसेफ शाइन बनाम भारत संघ मामले का हवाला देते हुए कहा कि धारा 497 आईपीसी को असंवैधानिक घोषित किया जा चुका है।
मामला 3 जनवरी 2018 को सिटी थाना में दर्ज एफआईआर से संबंधित था। शिकायतकर्ता ने पुलिस को दी शिकायत में आरोप लगाया था कि 2 और 3 जनवरी की मध्यरात्रि करीब 2 से ढाई बजे वह अपने कमरे में सो रहा था और उसकी पत्नी दूसरे कमरे में थी।
इसी दौरान उसका मामा का बेटा उनके घर आया और उसे पत्नी के साथ आपत्तिजनक अवस्था में देखा गया। दावा किया कि 2 और लोगों ने भी घटना देखी थी। इसके बाद उसने 100 नंबर पर फोन किया, लेकिन पुलिस के पहुंचने से पहले वह मौके से भाग गया।
पुलिस ने जांच के दौरान घटनास्थल का निरीक्षण कर नक्शा तैयार किया और गवाहों के बयान दर्ज किए। आरोपी को 3 जनवरी 2018 को गिरफ्तार किया गया। आरोपी और शिकायतकर्ता की पत्नी का चिकित्सकीय परीक्षण कराया गया।
आरोपी के कपड़े और अन्य नमूने कब्जे में लेकर एफएसएल भेजे गए। शिकायतकर्ता की पत्नी का बयान दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 164 के तहत मजिस्ट्रेट के समक्ष भी दर्ज कराया गया।
अदालत में अभियोजन ने 12 गवाह पेश किए। शिकायतकर्ता की पत्नी, जो अभियोजन की महत्वपूर्ण गवाह थी, अदालत में यौन संबंध होने की बात से इनकार किया। उसने बताया कि उसने भोजन मांगने के लिए दरवाजा खटखटाकर आया था। उसने दरवाजा खोला और इसी दौरान उसके पति ने बाहर से दरवाजा बंद कर दिया। पुलिस के पहुंचने के बाद दरवाजा खोला गया।
अदालत ने कहा कि शिकायतकर्ता ने भी अपनी पत्नी को यौन संबंध बनाते हुए प्रत्यक्ष रूप से नहीं देखा था। अन्य गवाहों ने केवल आरोपी के कमरे में मौजूद होने और पकड़े जाने की बात कही। मेडिकल अधिकारी की राय में यौन संबंध साबित नहीं हुए। साथ ही अदालत ने पाया कि कृष्ण कुमार घर में किसी अपराध को करने के उद्देश्य से घुसा था, यह भी साबित नहीं हुआ।
क्या थी धारा 497?
वरिष्ठ अधिवक्ता अश्विनी तिवारी ने बताया कि भारतीय दंड संहिता की धारा 497 व्यभिचार (विवाहेतर संबंध) से संबंधित थी। इसके तहत किसी विवाहित महिला के साथ उसकी सहमति से संबंध बनाने वाले पुरुष को अपराधी माना जाता था, यदि महिला के पति की सहमति या मिलीभगत न हो। इस प्रावधान में महिला को अपराधी नहीं माना जाता था। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में धारा 497 को असंवैधानिक घोषित करते हुए समाप्त कर दिया।