कोसली उपमंडल मुख्यालय से 20 किलोमीटर कि दूरी पर स्थित गांव बव्वा करीब 600 साल पूर्व काल्हाराम व भोलाराम दो भाइयों ने बसाया था। गांव के लोगों से मिली जानकारी के अनुसार बव्वा गांव, जोकि नाहड़िया नवाब की रियासत का ऐतिहासिक गांव रहा है।
गांव में जहां दो दशक पहले लोगों का मुख्य पेशा खेतीबाड़ी रहा है, वहीं गांव में आज युवाओं का रुझान नौकरी की तरफ है। 2500 मतदाताओं एवं साढ़े चार हजार की आबादी के गांव में अब करीब 300 युवा तीनों सेनाओं में कार्यरत हैं। वहीं गांव से दो जज हैं, वहीं तीन स्वतंत्रता सेनानी हुए हैं।
गांव में बाबा पूर्णमल हैं पूज्य देवता
बव्वा गांव में बाबा पूर्णमल पूज्य देवता हैं। इसके साथ गांव में सीतला माता का मंदिर है, जहां साल में होली के बाद लगातार तीन बुधवार को मेला लगता है, जिसमें नवविवाहित गठजोड़ा की जात लगाने पहुंचते हैं, वहीं नवजात बच्चों के बाल भी उतारने की प्रथा यहां दर्जनों गांवों के लोग पूरी करने पहुंचते हैं।
गांव में उपलब्ध सुविधाएं
गांव में वरिष्ठ माध्यमिक विद्यालय, लड़कियों के हाई स्कूल के अलावा सीएचसी, पशु अस्पताल, चार आंगनबाड़ी केंद्र, पंचायत घर हैं। जनस्वास्थ्य विभाग की ओर से नहरी परियोजना से पेयजल की सप्लाई दी जाती है।
यह बोले ग्रामीण
आजादी से पहले का ऐतिहासिक गांव होने के बाद भी गांव में लोगों को यातायात के साधनों का अभाव अखरता है। ग्रामीणों की ओर से बार-बार राजनेताओं से मांग के बाद भी केवल आश्वासन ही मिलते आ रहे हैं।
-सतपाल यादव, ग्रामीण
गांव में शिक्षा का स्तर आजादी के बाद से बेहतर रहने व पास के गांवों के युवाओं में खेलों के प्रति रुझान होने के बाद भी गांव में खेल सुविधाओं का अभाव बना हुआ है। ऐसे में तुरंत इन व्यवस्थाओं पर ध्यान दिए जाने की जरूरत है।
- अरुण यादव
गांव के लोगों में नवाबी समय से ही खेलों में खासा रुझान रहा है, खासकर कबड्डी, वॉलीबाल के साथ-साथ एथलेटिक्स में राष्ट्रीय स्तर के खिलाड़ी दिए हैं, लेकिन गांव में स्टेडियम के अभाव में खेल प्रतिभाएं दम तोड़ रही हैं।
- सतीश कुमार
गांव में वैसे तो मूलभूत सुविधाओं की कमी नहीं है, लेकिन गांव से आश्रम तक जाने वाले रास्ते में लोक निर्माण विभाग की लापरवाही के चलते पानी भरा रहता है। सांसद से लेकर विधायक तक दो दशक से गुहार लगाते आ रहे हैं, लेकिन समस्या का समाधान नहीं हो पा रहा है।
- जीतेंद्र कुमार