कोरोना संक्रमण से खुद को बचाते हुए अपने परिवार और बच्चों को बचाने की जिम्मेदारी डॉक्टर माताएं बखूबी निभा रहीं हैं। घर जाकर खुद को आइसोलेट रखती हैं, जिससे बच्चों या परिवार के किसी अन्य सदस्य को कोरोना का संक्रमण न हो। आज मातृ दिवस पर ऐसी माताओं को सलाम।
बेटी भी है डॉक्टर, उससे मिलती है हिम्मत : डॉ. निशि जिंदल
डिप्टी सिविल सर्जन डॉ. निशि जिंदल कोरोना संक्रमितों के इलाज के साथ ही परिवार भी संभाल रहीं हैं। दो बच्चों की मां हैं। बेटी भी दिल्ली में डॉक्टर है। वह दो बार कोरोना संक्रमित हो चुकी हैं। अस्पताल के मुख्य प्रशासनिक कार्य की जिम्मेदारी इन्हीं पर है। तीन निजी अस्पतालों का नोडल अधिकारी भी बनाया गया है। इन अस्पतालों में ऑक्सीजन और बेड की सुविधाएं सुचारु रखने की जिम्मेदारी इन्हीं पर है। कोरोना काल में फ्रंट फाइटर के तौर जिम्मेदारी निभा रहीं डॉ. निशि अस्पताल में लगातार 12-15 घंटे तक काम कर रही हैं। कोरोना संक्रमण को रोकने की दिशा में स्क्रीनिंग महत्वपूर्ण हैं, अब तक पांच हजार से अधिक लोगों की स्क्रीनिंग कर चुकी हैं। वह बताती हैं कि ये ऐसी घड़ी है, जिसमें सबको एकजुट होकर काम करना होगा। परिवार में पति और बेटी डॉक्टर हैं, उनकी लगन, मेहनत और जुझारू पन देखकर हिम्मत मिलती है।
बेहतर इंतजामों से ही कोरोना को हरा सकते हैं : डॉ. शालिनी मेहता
डॉ. शालिनी मेहता सिविल अस्पताल की नेत्र रोग विशेषज्ञ हैं। जब सिविल अस्पताल के मुख्य प्रशासनिक अधिकारी कोरोना संक्रमित हो गए तो प्रशासनिक कार्यों की जिम्मेदारी इन्होंने बखूबी निभाई। वह खुद कोरोना संक्रमित हो चुकी हैं। संक्रमण से उभरने के 7 दिन बाद ही इन्होंने ड्यूटी पर वापस लौटकर मोर्चा संभाल लिया था। प्रशासनिक कार्यों के साथ ही नेत्र रोगियों की जांच भी की। सुबह 9 से शाम पांच बजे तक अस्पताल में रहकर व्यवस्था को संभालना और फिर घर जाकर भी डॉक्टरों और स्टाफ के संपर्क में रहकर कोरोना मरीजों की सेवा की दिशा में काम किया। वह कहती हैं कि बेहतर इंतजामों से ही कोरोना को हराया जा सकता है। इसके लिए प्रयास करना उनकी प्राथमिकता में है। उनकी एक बेटी है, जिनका विवाह हो चुका है।
हारकर घर नहीं बैठ सकते हैं : डॉ. मोना नागपाल
डॉ. मोना नागपाल सिविल अस्पताल में मनोरोग विशेषज्ञ हैं। इनको कोरोना के इस काल में फिलहाल इमरजेंसी वार्ड में ड्यूटी करने की जिम्मेदारी दी गई है। सबसे अधिक खतरे में इमरजेंसी के डॉक्टर ही काम करते हैं। कोरोना के मरीजों की जांच करना उन्हें ऑक्सीजन देना, दाखिल करना और उनकी हिस्ट्री तैयार करना और इमरजेंसी में काम करने वाले स्टाफ को प्रेरित करते हैं, यह असल कोरोना फाइटर बने हैं। लगातार आठ घंटे इमरजेंसी में संक्रमण के बीच रहकर अपनी ड्यूटी निभा रहीं हैं। वह कहती हैं कि ये ऐसी घड़ी है, जहां ड्यूटी को पूरे समर्पण भाव से निभाना है। हम इससे हार कर घर नहीं बैठ सकते हैं। लोगों से अपील है कि वो कोविड नियमों का पालन करें।
शायद इस घड़ी से लड़ने के लिए डॉक्टर बने थे : डॉ. प्रीति
डॉ. प्रीति पिछले एक साल से कोरोना के खिलाफ काम करने वाले उन फाइटर में शामिल हैं, जो पहले दिन से मोर्चे पर डटी हुईं हैं। कोरोना के पहले रोगी का सैंपल इन्होंने ही लिया था। सैंपलिंग के लिए ये 18 घंटे लगातार अस्पताल में रहकर काम कर चुकी हैं। हर स्टाफ के साथ मिलकर रोगियों के सैंपल लेना, उनकी जांच करना इनका मुख्य कार्य है। इनको ये भी पता है कि ये किसी भी वक्त संक्रमण का शिकार हो सकती हैं, लेकिन इनका कहना है कि खुद की फिक्र कम है, लेकिन ड्यूटी इस वक्त सबसे महत्वपूर्ण है। शायद इस घड़ी से लड़ने के लिए ही डॉक्टर बने थे। घर में दो बच्चे हैं, जिनका पति और सास ख्याल रखते हैं। वह खुद को घर पर आइसोलेट ही रखती हैं।
दो बच्चों से दूर रहती हूं, खुद को आइसोलेट रखना होता है : डॉ. शशि गर्ग
डॉ. शशि गर्ग पहले कोविड की नोडल अधिकारी भी रह चुकी हैं। अब इनको सबसे बड़ा जिम्मा अस्पतालों में बेड और ऑक्सीजन की व्यवस्था को देखने का दिया गया है। दिन भर अस्पतालों का निरीक्षण करना लोगों की परेशानियां सुनना और डॉक्टरों को बेहतर सुविधाएं देने का जिम्मा इन्हीं को दिया गया है। डॉ. शशि गर्ग कहती हैं कि उन्हें जो भी ड्यूटी मिलती है वह पूरी ईमानदारी से निभाती हैं। घर पर दो बच्चे हैं, वह घर जाकर खुद को आइसोलेट कर लेती है। उनकी सुरक्षा की जिम्मेदारी भी उन्हीं पर है। बच्चों से दूर रहना होता है।