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थियेटर की दुनिया : नाटक ही है समाज की महत्वपूर्ण कड़ी : राजेश

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कुलदीप राठी
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समालखा। रंगकर्म की दुनिया में दादा के नाम से विख्यात निर्देशक राजेश सिंह अब तक हजारों युवाओं को कला की दुनिया से जोड़ चुके हैं। आज सैकड़ों युवा उनसे सीखकर सितारे बन चुके हैं। इसलिए कला की दुनिया के लोग उन्हें राजेश दादा कहकर पुकारते हैं।
बिहार विश्वविद्यालय से स्नातक करने के बाद उनका झुकाव शुरू से ही रंगकर्म में रहा। आखिरकार उन्होंने अपना रास्ता चुन लिया और पूरा जीवन ही थियेटर को ही समर्पित कर दिया। नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा (एनएसडी) से न केवल खुद स्नातक की डिग्री हासिल की और हजारों युवाओं की धड़कनों में रंगकर्म की दुनिया को बसा दिया। निर्देशक राजेश सिंह इन दिनों पानीपत इंस्टीट्यूट ऑफ इंजीनियरिंग एंड टेक्नॉलोजी (पाइट) में चलो थियेटर उत्सव में पहुंंचकर एनएसडी की तरफ से नाटकों का निर्देशन और मंचन कर रहे हैं। रास कला मंच आयोजक बना है। इसी दौरन अमर उजाला ने निर्देशक राजेश सिंह से विशेष बातचीत की। इसमें दादा राजेश सिंह ने थियेटर की दुनिया को साझा किया।
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दो बेटियों और एक बेटे के पिता राजेश सिंह का जन्म बिहार के चंपारन में हुआ। जब वे छोटे थे, तब भी उन्हें नाटक देखने और नाटक करने का शौक था। बड़े हुए तो उन्हें समझ में आया कि ये शौक ही उनका जीवन है। यही उनकी सांसें हैं। जब वह बाबूजी नाटक में नौटंकी करते हैं और नौटंकी करते-करते अंतिम सांस लेते हैं तो उसमें उनके खुद के जीवन की झलक भी दिखाई देती है। हालांकि परिवार की तरफ से उन्हें नाटक क्षेत्र में जाने की स्वीकृति थी लेकिन राजेश सिंह बताते हैं कि आज भी समाज में थियेटर क्षेत्र को स्वीकृति नहीं मिली है। परिवार के सदस्य अपने बच्चे के करिअर को लेकर झिझकते हैं। उन्हें समझना होगा कि थियेटर क्षेत्र में करिअर की असीम संभावनाएं हैं। अब तो वेब-सीरीज में ही काफी पैसा मिल रहा है। कॉलेज व यूनिवर्सिटी में अलग से कोर्स चलाए जा रहे हैं। नई शिक्षा नीति में अभिनय को विशेष तौर पर शामिल किया गया है।



थ्री इडियट्स के रैंचों: पेशे से नहीं कर पाएंगे न्याय:


राजेश सिंह ने बताया कि कई बार कुछ बच्चे आते हैं और बताते हैं कि उनके अभिभावक उन्हें इस क्षेत्र में जाने नहीं दे रहे। तब वे उनके अभिभावकों से बात करते हैं। उन्हें समझाते हैं कि बच्चों को अपने मन की करने दें। इन्हें मेहनत से आगे बढ़ने दें। जब बच्चे अपने मन की करेंगे तो ज्यादा खुश रहेंगे। अगर वे डाॅक्टर नहीं बनना चाहते और डाॅक्टर बन गए तो अपने पेशे से न्याय नहीं कर पाएंगे। साथ ही खुश भी नहीं रह सकेंगे। थियेटर क्षेत्र में अब कलाकार अभाव में नहीं रहते। बॉलीवुड से लेकर हॉलीवुड तक उनके लिए दरवाजे खुले हैं।



जिम्मेदारी बढ़ाएगी थियेटर: 25 से अधिक में किया काम, 200 से ज्यादा का मंचन:



निर्देशक राजेश सिंह का कहना है कि समाज को थियेटर को पूरी स्वीकृति देनी होगी। समाज के लोग थियेटर को पसंद तो करते हैं लेकिन टिकट लेकर थियेटर देखने नहीं आते। जब थियेटर आर्थिक रूप से संपन्न हो जाएगा तो इस क्षेत्र से जुड़ा प्रत्येक व्यक्ति सफल होता जाएगा। इसके लिए समाज और सरकार को अपनी जिम्मेदारी निभानी होगी। राजेश सिंह कहते हैं कि थियेटर आपके जीवन जीने के नजरिए को बदलता है। यह किसी सास बहू के सीरियल जैसा नहीं होता। यह आपको असल जीवन के दर्शन करता है। यह मनोरंजन का साधन तो है ही, साथ ही आपको सामाजिक हालात से रूबरू भी कराता है। वे राजेश सिंह बतौर निर्देशक 25 से अधिक नाटकों में काम कर चुके हैं। इसके अलावा दो सौ से अधिक नाटकों में मंचन कर चुके हैं।


राजेश सिंह ने बताया कि उनसे हजारों बच्चे यह विद्या सीख चुके हैं। उनसे सीखकर कई युवा बॉलीवुड से लेकर वेब-सीरीज में काम कर चुके हैं लेकिन वह किसी का नाम नहीं लेना चाहते। उनके नाम की वजह से खुद को आगे नहीं करना चाहते। युवाओं ने मेहनत की और आगे बढ़ें। इसी तरह सभी बढ़ते जाएं। वह किसी के नाम को भुनाना नहीं चाहते। किसी के नाम के साथ खुद को क्रेडिट नहीं देना चाहते।





साहित्य कला परिषद सरकार से मिला सर्वश्रेष्ठ निर्देशक का पुरस्कार
बिहार विश्वविद्यालय से स्नातक राजेश सिंह ने शुरुआत में श्रीराम सेंटर फॉर परफॉमिंग आर्ट्स नई दिल्ली में थियेटर में प्रशिक्षण प्राप्त किया। बाद में उन्होंने साहित्य कला परिषद रैपेट्री कंपनी और श्रीराम सेंटर रैपेट्री कंपनी में कलाकार के रूप में काम किया। उन्होंने 2006 में थियेटर तकनीक और डिजाइन में विशेषज्ञता के साथ नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा से स्नातक की उपाधि प्राप्त की। उन्होंने गंधर्व महाविद्यालय से संगीत में भी प्रशिक्षण प्राप्त किया। उन्होंने 2008 में लंदन एकेडमी ऑफ म्यूजिक एंड ड्रामेटिक आर्ट्स यूनाइटेड किंगडम में एडवांस थियेटर डिजाइन, डायरेक्शन और स्टेज मैनेजमेंट का अध्ययन किया।
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बीवी कारत, केएन जैसे प्रख्यात थियेटर हस्तियों के साथ काम करते उन्होंने डिजाइन और निर्देशन में अपनी शैली विकसित की। रास, काफ्का की मेटामोर्फोसिस, रामलीला, जांच पड़ताल, राग दरबारी, अपना अपना सवाल, पोस्टर, एक जोरदार लड़की की कहानी, एक कलम सड़क किनारे, ब्लैकबोर्ड लैंड, कैसे पूरी तरह से गायब हो जाए और कभी न पाएं, जैसे उनके प्रशंसित नाटक हैं। उनके नाटकों को दो बार सर्वश्रेष्ठ नाटक श्रेणी के तहत चुना गया और उन्हें साहित्य कला परिषद सरकार से सर्वश्रेष्ठ निर्देशक का पुरस्कार मिला।
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