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पुरानी तहसील में पड़े मतदाता पहचान पत्र, बताया रिजेक्ट,निकले सही

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अगर आपको कई वर्ष पहले आवेदन करने के बाद भी अभी तक मतदाता पहचान पत्र नहीं मिला है तो हो सकता है कि पुुुरानी तहसील के कबाड़ में वह आईडी कार्ड मिल जाए। जिसका कोई भी गलत इस्तेमाल कर सकता है। यहां एक नहीं बल्कि सैंकड़ों मतदाता पहचान पत्र कबाड़ में पड़े हैं। इन्हें जिला प्रशासनिक अधिकारियों का कहना है कि यह आईडी कार्ड 20 से 30 साल पुराने, रिजेक्जेट और ब्लैक एंड व्हाइट है, इसलिए कबाड़ में फेंक दिया गया है। जबकि जांच पड़ताल की गई तो ये कार्ड रिजेक्टिड या गलत नहीं, बल्कि असली निकले। इनके नाम पता और पिता या पति के नाम के साथ विधानसभा क्षेत्र भी सही पाया गया। इन कार्डों को बनवाने में इन आवेदनकर्ताओं की मेहनत, जिला प्रशासन की मेहनत और चुनाव आयोग द्वारा इन पर दिए गए दिशा-निर्देशों के साथ इसकी लागत को भी कबाड़ बना दिया गया है।
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अधिकारी बोले-20, 25 साल पुराने हैं कार्ड, जांच में निकला गलत-
जिला प्रशासनिक अधिकारियों ने बताया कि ये कार्ड 20 से 30 साल पुराने हैं। अब रंगीन कार्ड बनाकर दिए जा रहे हैं। जब कुछ कार्डों पर तिथि देखी गई तो यहां 2007 तक की तारीख मिली, जिससे अंदाजा लगाया जा सकता है, इन कार्डों को बने 10 से 12 साल हुए हैं। अधिकारियों की ये बयानबाजी गलत साबित हुई।
बताया रिजेक्टेड, निकले सही-
अधिकारियों ने इन कार्डों को रिजेक्टेड बताया, उनका कहना था कि इनके बदलाव करते हुए दूसरे कार्ड बना दिए गए हैं। जबकि इन कार्डों की जांच पड़ताल की गई तो इन पर नाम, पता यहां तक की पिता और पति के नाम के साथ विधानसभा क्षेत्र तक सही मिले, अधिकारियों की ये बयानबाजी भी गलत साबित हुई।
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अधिकारी बोले, चेहरा तो नहीं होगा मैच-
अधिकारियों का मानना है कि इन मतदाता पहचान पत्रों का कोई भी दुरुपयोग नहीं कर सकता। किसी भी प्रकार के प्रयोग में पहचान पत्र में फोटो को आसानी से पहचाना जा सकता है, जबकि इसके पीछे की सच्चाई ये है कि अधिकतर मतदाता पहचान पत्रों में फोटो साफ ही नहीं होती, वहीं मैच करते हुए चेहरे वाले कार्ड का भी इस्तेमाल किया जा सकता है।
ऐसे किया जा सकता है दुरुपयोग-
इस प्रकार के मतदाता पहचान पत्रों की मदद से किसी भी होटल में कमरा आसानी से मिल सकता है। इनसे स्टांप पेपर तक भी खरीदे जा सकते हैं। इनसे कहीं भी अपनी असल आईडी को छिपा कर किसी दूसरे की आईडी के रूप में प्रस्तुत किया जा सकता है। कोई भी अपराधी अपराध करने के बाद पुलिस को गुमराह करने के लिए इनका इस्तेमाल कर सकता है।
बड़ा सवाल- सालों पुराने हैं, तो आज तक लोगों के घर क्यों नहीं पहुंचे-
प्रशासनिक अधिकारियों ने बताया कि ये सालों पुराने कार्ड थे, उनकी इस बयानबाजी पर सबसे बड़ा सवाल ये है कि अगर ये मतदाता कार्ड सालों पुराने थे तो आज तक प्रशासनिक अधिकारियों व बीएलओ या अन्य कर्मचारियों द्वारा इन्हें असल मालिकों तक क्यों नहीं पहुंचाया गया।
लापरवाही से मेहनत और पैसा दोनों बर्बाद-
प्रशासनिक अधिकारियों की इस बड़ी लापरवाही से मतदाता कार्ड के आवेदनकर्ता, कार्ड बनाने वाले ठेकेदार, प्रशासनिक अधिकारियों की तो मेहनत खराब ही हुई, साथ में इनको बनाने के लिए जो पैसा खर्च हुआ वो भी बर्बाद हुआ। यह बस कुछ कुछ अधिकारियों व कर्मचारियों की लापरवाही का नतीता ही है।
वर्जन-
1990 के रिजेक्टिड मतदाता कार्ड हैं-
पुरानी तहसील में पुराने रिजेक्टिड मतादाता कार्ड पड़े हैं, जो रिजेक्टिड हैं। ये सन 1990 से भी पहले के हैं, इनकी जगह दूसरे रंगीन कार्ड बनाए थे, अब ये खत्म हैं। इसलिए कबाड़े में डाल रखे हैं। एक लॉट खराब आ गया था। ये पुरानी बात है, इसके बारे में मैं कुछ नहीं कह सकता।
- अर्जुन भटेजा, चुनाव तहसीलदार।
वर्जन-
20-25 साल पुराने हैं-
यहां करीब 20-25 साल पहले वेयर हाउस होता था, ये उसी समय के करीब दो दशक पुराने हैं। ऐसे किसी का कार्ड गलत इस्तेमाल नहीं किया जा सकता। कार्ड पर आदमी का चेहरा भी तो मैच होना चाहिए। अब सबके रंगीन कार्ड भी बनाए गए हैं।
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- सुमेधा कटारिया, उपायुक्त एवं जिला निर्वाचन अधिकारी, पानीपत।
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