आज बेटी बचाओ- बेटी पढ़ाओ अभियान को एक साल का हो गया है। सालभर बीतने के बाद भी यह अभियान अभी तक लोगों की सोच बदलने में कामयाब नहीं हो सका।
सालभर में शहर में चार बच्चियों को ठुकराया गया। इनमें से बच्ची परी का मुद्दा सुखियां बना रहा। अन्य तीन जगहों पर तो बच्चियों को जन्म लेने के बाद ही फेंक दिया गया।
इनमें से दो बच्चियों की परवरिश बाल ग्राम में हो रही है। जबकि एक अन्य आठ माह की नवजात की मौत हो गई थी। ये घटनाएं साबित करती हैं कि सरकार की ओर से किए जा रहे प्रयास सिरे नहीं चढ़ पा रहे हैं।
लोगों की रूढिवादी सोच अभी तक नहीं बदली है। सालभर के आंकड़ों पर अगर नजर डाली जाए तो सारे प्रयासों के बाद भी अभी लिंगानुपात 892 से बढ़कर 895 पहुंचा है। यानी साल भर में केवल तीन बालिकाएं भी बढ़ सकी हैं।
औद्योगिक नगरी पानीपत से 22 जनवरी 2015 को ही ऐतिहासिक अभियान बेटी बचाओ-और बेटी पढ़ाओ की शुरुआत हुई थी। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने यहां मंच से झोली पसारकर बेटियों को बचाने की भीख मांगी थी।
इस अभियान की दुनियाभर में सराहना हुई थी। सभी को लगा कि हालात बदलेंगे, बेटियों के अनुपात में बढ़ोतरी होगी। अब बेटियों को पैदा होते ही फेंका नहीं जाएगा।
लेकिन अभियान का असर धरातल पर देखने में नहीं मिला। बीते एक साल में लोगों की सोच ने चार बेटियों को दुत्कारा है। तीन बेटियों को तो खाली जगह पर फेंक दिया था। जबकि एक बेटी (परी) को बेटे की चाहत में दुत्कार दिया गया था। आज तक दुत्कारी गई बच्चियों के गुनहगारों का पता नहीं लगाया जा सका है।
एक साल में इन बेटियों पर उठाए सवाल
17 जून को सिविल अस्पताल में न्यू रामनगर निवासी कविता ने बच्ची को जन्म दिया। बाद में महिला ने बच्ची को यह कहकर अपनाने से मना कर दिया कि उसने लड़के को जन्म दिया था।
बाद में डीएनए टेस्ट के बाद महिला को पांच माह बाद लड़की ही सौंपी गई थी। 23 जून को गांजबड़ के पास झाड़ियों में सात माह का भ्रूण मिला था।
आठ अक्तूबर को जाटल रोड पर खाली प्लाट में बच्ची को पैदा होते ही फेंक दिया गया था। जिसको पुलिस ने सिविल अस्पताल में भर्ती करवाया था।
ऐसे ही 20 अक्तूबर को जाटल अनाथालय के सामने करीबन नौ माह की बच्ची लावारिस हालत मे मिली थी। बच्चियों को दुत्कारने का सिलसिला यहीं नहीं थमा। अक्तूबर माह में ही गांव मांडी में साढ़े सात माह की बच्ची का भ्रूण कचरे के ढेर में मिला। जांच के बाद पता चला कि भ्रूण लड़की का था।
नहीं हो सका सुधार
एक साल में प्रशासन ने बेटियों को बचाने के लिए करोड़ों रुपये खर्च किए। जिले में विभिन्न कार्यक्रमों के माध्यम से लोगों को जागरूक किया गया। स्वास्थ्य विभाग ने भी मेडिकल स्टोरों और अल्ट्रासांउड सेंटरों पर छापेमारी कर गर्भपात की दवाइयां पकड़ी। इसके बाद भी कोई खास असर नहीं हुआ। लिंगानुपात में भी कोई खास सुधार नहीं देखने को मिला। साल 2014 में लिंगानुपात 892 था, जोकि साल 2015 में बढ़कर 895 ही हो पाया है।
कार्रवाई का नहीं हो रहा असर
बेटियों को बचाने के लिए बिना अनुमति के एमटीपी किट बेचने वाले मेडिकल स्टोर संचालक और अल्ट्रासाउंड सेंटर और स्वास्थ्य विभाग के निशाने पर रहे हैं। विभाग की टीम आए दिन छापे मारकर मेडिकल स्टोरों से किट पकड़ रही है। मेडिकल स्टोर संचालकों के खिलाफ मामला दर्ज कराए जा रहे है। फिर भी कार्रवाई का खास फर्क देखने को नहीं मिल रहा है।
समालखा खंड में बढ़ी लड़कियों की संख्या
समालखा खंड के गांवों में लिंगानुपात में वर्ष 2014 की तुलना में 2015 के दोरान सुधार हुआ है। हालांकि स्वास्थ्य विभाग और महिला एवं बाल विकास विभाग के आकड़े मेल नहीं खा रहे। फिर भी दोनों विभागों के आंकड़ों में लड़कियों की संख्या में बढ़ोतरी दिखाई गई है। साल 2013 में खंड समालखा में महिलाओं की संख्या जहां प्रति 1000 पुरुष पर 802 थी। वहीं 2014 में यह घटकर 795 रह गई थी, जो 2015 के दिसंबर में बढ़कर 889 हो गई।
पीएचसी वाइज लिंगानुपात
पीएचसी लिंगानुपात
सिवाह 787
काबड़ी 946
अहर 745
मांडी 849
नारायणा 933
नौल्था 1078
बापौली 1019
कवी 819
उग्रा खेड़ी 988
चुलकाना 968
मतलौडा 943
पट्टीकल्याणा 908
ऊझा 906
सींक 847
जिले के लिंगानुपात में बढ़ोतरी हुई है। सरकार और विभाग अपनी ओर से पूरी मेहनत कर रहा है। लोगों को भी अभियान में सरकार और स्वास्थ्य विभाग का साथ देना पड़ेगा। स्वास्थ्य विभाग के द्वारा गर्भपात की दवाईयां बेचने वाले के खिलाफ कड़े कदम उठाए जा रहे हैं।
डॉ. इंद्रजीत सिंह धनखड़, सिविल सर्जन पानीपत।