पानीपत का एसएनसीयू वार्ड बीमार, पिछले 40 दिनों में 88 नवजातों को दाखिल कराया गया, वहीं बेहतर परामर्श व इलाज ना मिलने के कारण 40 बच्चों को खानपुर मेडिकल कॉलेज रेफर करना पड़ा। जबकि छह बच्चों की मौत हुई है। इतना ही नहीं इनमें से मात्र 21 नवजातों को डिस्चार्ज किया जा सका। इसका बड़ा कारण सिविल अस्पताल में बाल रोग विशेषज्ञ व वेंटीलेटर की कमी बताया गया है। वार्ड में फोटो थरैपी मशीन, सी पैप व बिली ब्लेकेट की भी कमी है। गत दिनों सामाजिक संस्था ने सी पैप मशीन अस्पताल को दान की थी, लेकिन ये अब तक इंस्टॉल नहीं हो पाई है। इसलिए दमा रोगी बच्चों को सही इलाज नहीं मिल पा रहा है। इस संबंध में दो दिन पहले पंचकूला से स्वास्थ्य विभाग के उच्च अधिकारियों की मीटिंग भी हुई है। एसएनसीयू वार्ड का आउटपुट भी मात्र 19 प्रतिशत रहा गया, जो पिछले छह साल में सबसे कम रहा। सन 2018 में ये 82 प्रतिशत, 2017 में 77 प्रतिशत व 2016 में 68 प्रतिशत था।
पानीपत का एसएनसीयू वार्ड बीमार, सन 2018 में नवजातों के अधिकतर एडमिशन व नवजातों के बेहतर इलाज के लिए पानीपत के एसएनसीयू वार्ड को प्रदेश में प्रथम स्थान भी मिला था। अब सिविल अस्पताल में एमएस डॉ आलोक जैन व डॉ. निहारिका के रूप में दो ही पीडियाट्रीशियन है। डॉ. आलोक जैन प्रशासनिक कार्यों में व्यस्त रहते हैं। डॉ. निहारिका छुट्टी पर रहती है तो वार्ड की जिम्मेदारी अनुबंधित डॉ अभिषेक व डॉ कपिल पर रहती है।
तीन बच्चों की हो गई थी मौत : एसएनसीयू वार्ड में गत दिनों सही मेडिकल परामर्श न मिलने व वेंटीलेटर की कमी से कई माह पहले नवजातों की मौत हो गई थी। इसके बाद पंचकूला में उच्च अधिकारियों ने प्रदेश भर के बाल रोग विशेषज्ञों की मीटिंग बुलाई थी। इस मीटिंग में बच्चों की मौत के कारण पर चर्चा हुई है। पानीपत के चिकित्सा अधीक्षक डॉ अलोक जैन ने बताया कि एसएनसीयू वार्ड में संसाधनों की कमी है। बाल रोग विशेषज्ञों की भी कमी है। इसलिए थोड़ी परेशानी आ रही है। फिर भी वार्ड में उपचार के लिए आ रहे बच्चों की विशेष देखरेख की जाती है।
गर्मी में नहीं कूलर या एसी, बढ़ते तापमान में बच्चों को होता है तेज बुखार : 42 करोड़ रुपयों की लागत से बनाई गई सामान्य अस्पताल की बिल्डिंग उसकी खामियों के कारण हमेशा से ही चर्चित रही है। आलम ये है कि एसएनसीयू वार्ड, जहां बहुत जच्चा-बच्चा होते हैं, वहीं गर्मी से राहत पाने के साधन नहीं हैं। वार्ड में सिर्फ पंखे लगे हुए हैं, जो दिन चढ़ने के साथ-साथ बढ़ते तापमान में गर्म हवा देते हैं। जिस कारण बच्चों को तेज बुखार होता है। वार्ड में कूलर या एसी का कोई इंतजाम नहीं है।
सेंट्रल ऑक्सीजन और वेंटीलेटर की भी सुविधा होनी चाहिए : 20 शिशुओं के इलाज के लिए एक यूनिट में 20 वार्मर, 6 फोटोथैरेपी, 2 बबल सी पैप आठ सेक्शन मशीन, सेंट्रल ऑक्सीजन और वेंटीलेटर की भी सुविधा होनी चाहिए। लेकिन यहां एक वेंटीलेटर तक नहीं है, वहीं सिर्फ 14 वार्मर ही हैं। उन्हीं पर औसतन 20 नवजात एडमिट रहते हैं।
यूनिट संचालन के ये हैं मानक : विश्व स्वास्थ्य संगठन के मुताबिक एक यूनिट के संचालक के लिए 4 डॉक्टर, 11 स्टाफ नर्स, चार वार्ड ब्वॉय, तीन वार्ड आया, एक लैब टेक्नीशियन, दो स्वीपर, तीन गार्ड और एक डाटा एंट्री ऑपरेटर होने चाहिए।
24 जून 2018 का मामला जिसकी देश भर में चर्चा हुई : 24 जून 2018 एक बच्चे की एसएनसीयू वार्ड में नवजात की मौत हुई, जिसे अस्पताल प्रबंधन ने छिपा ली। जबकि उस समय 22 जून को ही अस्पताल का बिजली सिस्टम खराब हो चुका था, वहीं 25 जून की रात को एसी ठप पड़ गए और पांच बच्चों को रेफर किया गया। इनमें एक की मौत हो गई। तीन दिन बाद बिजली सिस्टम में सुधार हुआ। इसकी देश भर में चर्चा रही।
सीडब्ल्यूसी और हरियाणा महिला आयोग उठा चुका सवाल : 23 मई 2018 को सीडब्ल्यूसी की टीम और 4 दिसंबर को हरियाणा महिला आयोग की सदस्य सोनिया अग्रवाल ने एसएनसीयू वार्ड का निरीक्षण किया। एक बेड पर दो नवजात मिले तो इस पर उन्होंने तत्कालीन सीएमओ से शिकायत की और इसे सुधारने के लिए कहा गया। उन्होंने कहा कि ऐसे में नवजात को संक्रमण हो सकता है।
नवजातों के स्वास्थ्य को लेकर हम गंभीर है। जल्द सी पैप मशीन को इंस्टॉल किया जाएगा। वेंटीलेटर की भी जल्द आने की आशा है। अभी वार्ड शिफ्ट हुआ है। धीरे-धीरे सुविधाएं बढ़ेगी।
डॉ. आलोक जैन, एमएस सिविल अस्पताल