पानीपत। सावन का महीना आते ही चारों तरफ झूले डल जाते थे। दूर-दूर तक सावन के गीतों की गूंज सुनाई देती थी। गली-मोहल्ला सब एक परिवार की तरह सावन के रंग में रंग जाते थे। समय के साथ लोग बदल रहे हैं। वहीं रीति-रिवाजों की जगह फोन ले रहा है। गीतों व भजनों का तो महत्व ही खत्म होता जा रहा है। युवा पीढ़ी बस फोन तक सिमट कर रह गई है। सभी को चाहिए कि वे परंपराओं से जुड़े और अपने बच्चों को रीति-रिवाजों के साथ जोड़ने का काम करे ताकि पीढ़ी-दर-पीढ़ी सावन की फुहार को बढ़ाया जा सके।
परढ़ाना गांव की 60 वर्षीय सरोज देवी ने बताया कि वे अपने बचपन में सावन शुरू होते ही झूले झूलने लगते थे। स्कूल से आते ही गली-मोहल्ले के सभी बच्चों के साथ चाची-ताई, दादी सभी झूल झूलते थे। साथ ही सावन के गीत गाती थी उस समय सावन के मुख्य गीत अरी बहना तीजन की आई है बहार..., नन्हीं नन्हीं बुंदियां रे, सावन का मेरा झूलना रे, कच्ची नीम की निवौरी सावन जल्दी अइयो रे, शिव शंकर चले कैलाश कि बुंदियां पड़ने लगीं... आदि होते थे। गली-मोहल्ले की सभी औरतें और बच्चे इकट्ठा होकर झूला झूलते थे। ससुराल आने के बाद भी सावन लगते ही झूलों के लेकर उत्साह बन जाता था। अब समय के साथ सब कुछ बदल रहा है। लोगों ने स्वयं को फोन व अपने आप तक सीमित कर लिया है। अब न तो पहले वाली झूल रही और न ही पहले वाले गीत।
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सावन के गीतों की जगह फोन ने ले जगह
सींक गांव की 35 वर्षीय पिंकी मलिक ने बताया कि उसने बचपन में बहुत झूल झूले हैं। साथ ही अपनी मां, दादी, चाची, ताई, बुआ सभी के साथ सावन की पहली फुहार, भगवान शिव और झूल डालने के अनेक गीत गाए हैं लेकिन समय के अनुसार सब बदल रहा है। सावन के गीतों की जगह फोन ने ले ली है। मेरे बच्चे भी स्वयं को फोन तक सीमित रहने लगे हैं। मेरी व मेरे परिवार की कोशिश होती है कि उन्हें अपने रीति-रिवाजों के बारे में बताया जाए और उनसे जोड़ा जाए लेकिन कुछ भी पहले की तरह नहीं रहा है। पहले सावन आते ही गली-मोहल्ले, गांव में गीतों की गूंज सुनाई देती थी। महिलाएं व बच्चे पूरा सावन झूल झूलते थे और बुजुर्ग महिलाएं उनके साथ वहां बैठकर गीत गाते थी और पुराने समय की बातें बताती थी लेकिन अब न तो पहले वाली बुजुर्ग महिलाएं रही और न ही वे बच्चे जो पुराने समय की बातें सुनने में रूचि दिखाएं। सावन के गीतों के जगह फोन ले रहा है। बच्चे स्वयं तक सीमित रहने लगे हैं।