कोरोना काल में जब जीवन थम-सा गया था उस समय मेरे घर में एक नन्हा लैब्राडोर आया जिसका नाम सभी ने ऑस्कर रखा। मेरा बेटा तब सीनियर स्कूल में पढ़ता था। उसकी जिद पर ही हमने ऑस्कर को घर लाने का फैसला किया। उस समय मुझे कुत्तों से बहुत डर लगता था पर जैसे ही ऑस्कर आया उसकी मासूम आंखें और शरारतें धीरे-धीरे मेरे दिल का डर मिटाती चली गईं।
ऑस्कर ने कोविड की उदासी में बेटे को एक सच्चा साथी और दोस्त दिया। वह पढ़ाई के तनाव को कम करता था। मुझे नहीं पता था कि यही साथी आगे चलकर मेरे जीवन का अभिन्न हिस्सा बन जाएगा। समय बदला, बेटा अपनी उच्च शिक्षा के लिए बाहर चला गया। घर में खालीपन-सा आ गया। पर उस खालीपन को ऑस्कर ने भर दिया। उसने हमें अकेला महसूस नहीं होने दिया। आज तक उसने हमें रात में कभी अकेले नहीं छोड़ा। हमेशा परिवार की तरह साथ रहा। उसकी उपस्थिति से घर की सुरक्षा और सुकून दोनों मिल रहे हैं। अब ऑस्कर पांच साल का हो गया है। ऑस्कर की मौजूदगी ने मुझे यह एहसास कराया है कि जानवर सिर्फ घर की शोभा नहीं होते बल्कि वे सच्चे साथी होते हैं।
प्रस्तुति : डॉ. अनु कालड़ा, शिक्षाविद विराट नगर