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Panipat News: जिला नागरिक अस्पताल में हमेशा के लिए दफन हो गए 54 की मौत के राज

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जिला नागरिक अस्पताल में हमेशा के लिए दफन हो गए 54 की मौत के राज
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वर्षों से रखे-रखे खराब हो गए विसरा, पुलिस ने जांच के लिए नहीं भेजा लैब
कोर्ट में मामला विचाराधीन होने के कारण स्वास्थ्य विभाग नहीं कर सकता नष्ट

संदीप सिंह

पानीपत। पुलिस की लापरवाही कहें या फिर परिजनों की बदनसीबी। जिला नागरिक अस्पताल के शवगृह में रखे शीशे के जारों में 54 लोगों की मौत के राज हमेशा के लिए दफन हो गए। पुलिस और परिजन चाहकर भी अब कुछ नहीं कर सकते। कारण कि वर्षों पुराने ये विसरे किसी काम के नहीं रहे हैं। स्वास्थ्य विभाग की बेबसी है कि चाहकर भी इसे नष्ट नहीं कर सकते, क्योंकि मामला कोर्ट में विचाराधीन है।
दरअसल, मृतकों की मौत के असल कारण जानने के लिए विसरा प्रयोगशाला में भेजे जाते हैं। वहां से एक-डेढ़ माह में रिपोर्ट भी मिल जाती है, लेकिन सरकारी अस्पताल में 2012 से लेकर 2018 के बीच एकत्रित किए गए 54 विसरा अस्पताल में रखे-रखे खराब हो चुके हैं। पुलिस की जिम्मेदारी होती है कि अस्पताल से लैब भिजवाकर विसरा की जांच कराएं, ताकि मौत का सही कारण पता चल सके। अब सवाल उठता है कि अस्पताल में पड़े विसरे को पुलिस ने जांच के लिए क्यों नहीं भिजवाया, जबकि स्वास्थ्य विभाग की ओर से समय-समय पर पुलिस अधीक्षकों को इस संबंध में पत्र भी लिखे गए हैं।
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नाम न छापने की शर्त पर अस्पताल के डॉक्टर ने बताया कि अधिकतर हत्या व सुसाइड के केस में विसरा भेजा जाता है। काफी केस में पीड़ित और आरोपी पक्ष का आपस में समझौता हो जाता है, इसलिए पुलिस विसरा भेजने से बचती है। कारण कि अगर विसरा की रिपोर्ट में मौत की वजह स्पष्ट हो गई तो पुलिस को कार्रवाई करनी पड़ती है। कई केस ऐसे भी होते हैं, जहां जांच अधिकारी जान बूझकर विसरा जांच के लिए नहीं भेजते। इससे केस कमजोर हो जाता है। दूसरी ओर, स्वास्थ्य विभाग चाहकर भी इन्हें नष्ट नहीं कर सकता, क्योंकि पुलिस कोर्ट में विसरा नष्ट होने का हवाला देकर स्वास्थ्य विभाग को कठघरे में खड़ा कर सकती है।

यह होता है विसरा-
मेडिकल टर्म में विसरा पोस्टमार्टम के दौरान एकत्र किए जाने वाले बायो सैंपल को कहते हैं। फेफड़ा, किडनी, आंत, हृदय, मस्तिष्क जैसे मानव शरीर के अंदरूनी अंगों के नमूनों के संकलन को विसरा कहते हैं। इनमें कैमिकल भी डाला जाता है ताकि विसरा अधिक समय तक सुरक्षित रखा जा सके। विशेषज्ञों के अनुसार, विसरा डेढ़ साल तक ही सुरक्षित रह सकता है।


आखिर इतनी लापरवाही क्यों

2012 से रखे विसरा के जारों पर पर्ची लगाई गई थी। इस पर्ची पर केस से संबंधित डिटेल लिखी गई थी। अब अधिकतर जारों से पर्ची भी फट चुकी है। ऐसे में ये भी जानना मुश्किल है कि किस केस का कौन सा विसरा है। इतनी बड़ी लापरवाही क्यों बरती गई है, ये जांच का विषय है।

स्वास्थ्य विभाग की ओर से पोस्टमार्टम कराकर विसरा पुलिस को सौंपा जाता है। पुलिस का काम है कि इसको प्रयोगशाला में जांच के लिए भेजे। पुलिस की ओर से वर्षों पुराने विसरे नहीं उठाए गए। इनको उठाने के लिए पुलिस अधीक्षक को फिर से पत्र लिखेंगे।
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डॉ. जयंत आहूजा, सिविल सर्जन पानीपत।


पुलिस के पास इस तरह का कोई केस नहीं है, जिसका विसरा रिपोर्ट सिविल अस्पताल में रखा हो। वे इसकी जांच कराएंगे। ऐसा कोई विसरा मिला तो संबंधित थाना पुलिस और जांच अधिकारी से जवाब तलब किया जाएगा।

- अजीत सिंह शेखावत, पुलिस अधीक्षक, पानीपत।
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