कारगिल युद्ध में शहीद हुए अधिकतर जवानों को वह मान-सम्मान नहीं मिला जिसके वे हकदार थे, साथ ही इन शहीदों के परिवारों के सामने आज कई समस्याएं खड़ी हो गई हैं।
शहीद जवानों के लिए सरकार ने घोषणाएं तो अनेक कीं लेकिन वे धरातल पर लागू नहीं हो पाईं। सानौली का एक शहीद ऐसा था जो देश की रक्षा के लिए कारगिल में तो डटकर लड़ा लेकिन उसका परिवार आज अपनों से ही हार गया।
गांव अत्तोलापुर का जवान सुशील कुमार कारगिल युद्ध में शहीद हो गया था। आज उसके परिवार वाले काफी मुश्किल से घर का गुजारा चला पा रहे हैं। सुशील की पत्नी ने सुशील के शहीद होने के कुछ समय बाद ही दूसरी शादी कर ली। सरकार ने एक पेट्रोल पंप दिया था जिसे शहीद की पत्नी ने अपने भाई को दे दिया।
सुशील के बड़े भाई जगदीश ने बताया कि सरकार ने शहीद की पत्नी संतलेश को समालखा के पास पेट्रोल पंप दिया था।
संतलेश ने दूसरी शादी कर ली और पेट्रोल पंप को अपने भाई के हवाले कर दिया। जगदीश ने बताया कि उनकी मां सुशील के शहीद होने का गम नहीं सह पाई और कुछ साल बाद ही उनकी हार्टअटैक से मौत हो गई। सुशील का बड़ा भाई भी इसी गम में मर गया।
जगदीश के सामने खुद तथा बड़े भाई के बच्च्चों का खर्च चलाना भी मुश्किल हो रहा है। जगदीश स्कूल में चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी है। जगदीश ने बताया कि शहीद सुशील कुमार के नाम पर न ही सरकारी स्कूल का नाम रखा गया और न ही गांव में गेट बनाया गया।
ग्राम पंचायत ने प्रतिमा स्थापना के लिए थोड़ी सी जमीन दी थी। उस जमीन पर जगदीश ने अपने पैसों से सुशील कुमार की प्रतिमा स्थापित की। एक-दो साल तक तो जिला प्रशासन के अधिकारी गांव में शहीदी दिवस पर माल्यार्पण करने आते रहे मगर बाद में सब भूल गए।
सुशील कुमार की याद में भी गांवों में स्थित सरकारी स्कूलों में पुस्तकालयों का निर्माण 24 जून, 2002 को कराया गया लेकिन उनमें आज तक भी पुस्तकें नहीं हैं। इन पुस्तकालयों पर अब ताले लगे हुए हैं।