समालखा। नई अनाज मंडी स्थित जैन स्थानक में उपेंद्र मुनि ने श्रद्धा, विवेक और सेवा भाव रखने वाले व्यक्ति को सच्चा उपासक या सच्चा भक्त बताया। उन्होंने कहा कि जो तत्व चिंतन के द्वारा अपनी श्रद्धा को मजबूत करता है, सत्त पात्रों को दान देने में सदा आगे रहता है। साधुओं की सेवा करके पाप कर्म रूपी धूल को जो दूर फेंकता है व जिसमें अटूट श्रद्धा हो, धर्म तत्व का पूर्ण विवेक हो और सत्कर्म में प्रयत्नशील हो उसे उपासक अर्थात सच्चा भक्त कहते हैं।
उन्हाेंने बताया कि जिसे दिव्य काम भोगों की इच्छा नहीं होती, जो तृष्णा के नष्ट होने पर सुख का अनुभव करता है, वही उपासक है। जैन शास्त्रों में भगवान महावीर ने चार तरह के उपासक बताए हैं। प्रथम वो उपासक जो माता-पिता का दर्जा निभाते हुए नव दीक्षित साधुओं को हित भिक्षा देते हैं। दूसरे वो उपासक हैं जो भाई के समान प्रमाद हो जाने पर साधुओं की निंदा, आलोचन, व उन पर क्रोध नहीं करते हुए ह्रदय से उनका हित चाहने वाले हैं। उन उपासकों को मित्र के समान कहा गया है।