मैं रावण हूं तो तुम में से श्रीराम कौन। रावण के दहन के साथ जहन में आई इस बात ने लोगों को झकोरा, लेकिन सब धू-धूकर जलते रावण व उसके कुनबों को देखकर लौट आए। समाज ने आज न तो मर्यादा पुरुषोत्तम और न ही रावण के कर्मों से कोई सीख ली।
शहर समेत जिलेभर में दशहरा वीरवार को धूमधाम से मनाया गया। हर किसी ने रावण को बुराई का प्रतीक मानकर फूंका और उस पर बाण भी दागे। हमारा समाज आज कहां खड़ा है।
हम श्रीराम के अभिनय में हैं या फिर रावण का रोल अदा कर रहे हैं। हम आपको बताते हैं कि समाज में कितनी बुराइयां, अपराध हैं। इन सबको भी रावण दहन के साथ खत्म करने की जरूरत है।
आज हर रोज कत्ल और युद्ध
समाज में आज हर रोज कत्ल हो रहे हैं। समाज व समुदायों में बंटे लोगों के बीच झगड़ा किसी युद्ध से कम नहीं है। आए दिन लोगों पर हमले हो रहे हैं। हम जिले के क्राइम का रेशों देखे तो आईपीसी की धाराओं का 59.52 व एलएसएल की धाराओं का 40.48 प्रतिशत क्राइम है। इस साल अब तक हत्या की 50 वारदात हो चुकी हैं। गत वर्ष यह आंकड़ा 45 पर था। इसके अलावा जानलेवा हमले के 26 मामले सितंबर तक हो चुके हैं। यह गत वर्ष 27 मामले थे। इसके अलावा लड़ाई झगड़े व अन्य पांच सौ मामले दर्ज जिला पुलिस में सितंबर माह तक दर्ज हो चुके हैं।
समाज में इज्जत भी नहीं सुरक्षित
रावण ने सीता का हरण किया, लेकिन उसको छुआ तक नहीं। समाज में आज महिलाएं बीच बाजार में भी सुरक्षित नहीं हैं। शहर ही नहीं पूरे जिले में आए रोज दुराचार के मामले आ रहे हैं। इस साल जिले में दुराचार के 47 मुकदमे दर्ज हुए हैं। गत वर्ष 64 मामले थे। इसके अलावा शोषण के इस साल एक व गत वर्ष आठ मामले आए हैं।
यहां हर रोज हो रहा छल व हरण
रावण ने एक सीता का छल से हरण किया था, लेकिन समाज में आज हर रोज बच्चियों, किशोरियों व महिलाओं का अपहरण हो रहा है। पुलिस के इस साल सितंबर तक के आंकड़ों पर नजर डाले तो अपहरण के 16 केस दर्ज किए गए। पिछले साल अपहरण के मामले 15 थे। वहीं बहला फुसलाकर ले जाने के इस साल 58 केस दर्ज किए गए। पिछले साल यह आंकड़ा 67 पर था। धोखाधड़ी या छल के मामले देखें तो इस साल 119 केस दर्ज हो चुके हैं। ये पिछले साल 91 ही थे।
रावण था विद्वान आज की पीढ़ी पढ़ने में पिछड़ी
रावण को शास्त्रों में भी विद्वान बताया गया है, लेकिन आज की पीढ़ी तो पढ़ने में भी रावण की बराबरी नहीं कर पा रही। जिले की 2011 के अनुसार साक्षरता दर 83.7 प्रतिशत है। यह आंकड़ा आज की पीढ़ी के लिए खतरनाक है। सही मायने में देखा जाए तो एक बड़ी संख्या के बच्चे प्राथमिक शिक्षा तक नहीं ग्रहण कर रहे हैं। बाकी बचे भी कॉलेज जाते-जाते पढ़ाई छोड़ देते हैं। हायर एजुकेशन के लिए तो एक सीमित संख्या के ही बच्चे जा रहे हैं।
समाज में बेटियों का सम्मान नहीं
समाज में आज बेटियों का जरा सा भी आदर नहीं है। रावण पर अंगुली उठाने वाले समाज को अपनी तरफ भी देखना होगा। जिले में 2011 के लिंगानुपात पर नजर डालें तो 1000 लड़कों के आगे 864 लड़कियां ही हैं। इससे पहले 2001 की जनगणना के अनुसार यह रेशो 829:1000 ही था। देश को बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ का नारा देने वाली हॉली की धरती पर आज भी बेटियों की अनदेखी हो रही है। स्वास्थ्य विभाग के प्रयासों से लिंगानुपात के आंकड़े बेशक कुछ मजबूत हो सके हैं लेकिन लावारिस मिलने वाली बच्चियां समाज पर सवाल खड़ा कर रही हैं। सिविल अस्पताल में बच्ची परी 18 जून से अपनों के प्यार के लिए तरस रही है। प्रशासन उसको अपनों की गोद नहीं दिला पाया था कि गत सप्ताह जाटल रोड रेलवे ओवरब्रिज के पास एक नवजात बच्ची मिली। उसको संरक्षण मिल नहीं पाया था कि तीन दिन पहले शोंधापुर स्थित बाल अनाथालय के नजदीक एक और नवजात बच्ची मिली।
पढ़े लिखे समाज को भी जागरूकता की जरूरत
समाज पढ़ा लिखा है। बावजूद इसके लोगों को जागरूकता की जरूरत है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 22 जनवरी को पानीपत की धरती से बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ अभियान की शुरुआत की। उन्होंने मंच से बेटियों के लिए झोली फैलाई थी। इसके बाद भी बेटियों को वह सम्मान नहीं मिल पाया है। सरकार को स्वच्छता को लेकर भी अभियान चलाना पड़ा। गांव को छोड़कर शहर की तरफ देखे तो स्वच्छता केवल नाम की है।