पानीपत। अखिल भारतीय साहित्य परिषद् के दो दिवसीय 22वें प्रांतीय अधिवेशन में वेद ऋचाओं और हिंदी भाषा को हर व्यक्ति तक पहुंचाने का निर्णय लिया गया। परिषद इसके लिए लगातार काम करेगी। इसके लिए लोगों के बीच में जाने के साथ संस्कृति को मजबूत करने के लिए कार्यक्रम भी किए जाएंगे।
एसडी पीजी कॉलेज में आयोजित दो दिवसीय प्रांतीय अधिवेशन रविवार को संपन्न हुआ। अधिवेशन का विषय ‘आत्मबोध से विश्वबोध’ रहा। जिस पर साहित्यका ने अपने विचार साझा किए और साहित्य को सामाजिक परिवर्तन का वाहक बताकर राष्ट्र और इंसान की प्रगति पर बल दिया। दूसरे दिन के चतुर्थ सत्र में संपर्क कार्यकर्ता एवं बौधिक प्रमुख भूपेश अरोड़ा, कार्यकारी प्रांत अध्यक्ष रमेश चंद्र शर्मा, उपाध्यक्ष डॉ. मंजूलता और संगठन मंत्री डॉ. जगदीप शर्मा ‘राही’ ने अपने विचार रखे। पंचम चिंतन सत्र में हिंदी एवं हरियाणवी प्रकोष्ठ हरियाणा साहित्य एवं संस्कृति अकादमी पंचकूला के निदेशक डॉ. धर्मदेव विद्यार्थी निदेशक, विशिष्ट अतिथि समाजसेवी रोहतास कुमार और रामधन शर्मा रहे। समापन सत्र में मुख्य वक्ता कांगड़ा विश्वविद्यालय हिमाचल प्रदेश के पूर्व कुलपति प्रो. कुलदीप चंद अग्निहोत्री व कार्यकारी अध्यक्ष हरियाणा साहित्य एवं संस्कृति अकादमी पंचकूला के प्रो सारस्वत मोहन ‘मनीषी’ , संयुक्त मंत्री राष्ट्रीय कार्यकारिणी नीलम राठी, पूर्व कुलपति डीक्रस्ट यूनिवर्सिटी सोनीपत के पूर्व कुलपति प्रोफेसर राजेंद्र अनायत और राष्ट्रीय संयुक्त मंत्री प्रवीण आर्य ने अपने भाव व्यक्त किए।
प्रोफेसर राजेंद्र अनायत ने वेद ऋचाओं को जीवन में मार्गदर्शक बनाने का संदेश दिया। उन्होंने कहा कि वेद विशेष रूप से उनकी ऋचाएं (श्लोक) जीवन में मार्गदर्शन प्रदान करने वाले महत्वपूर्ण स्रोत हैं । वेदों में जीवन के हर पहलू जैसे कि आध्यात्मिकता, नैतिकता, सामाजिक आचरण और व्यक्तिगत विकास के बारे में ज्ञान मिलता है । वेद हमारे ज्ञान के भंडार हैं जो न केवल धार्मिक अनुष्ठानों के बारे में बताते हैं बल्कि जीवन के हर पहलू को समझने में हमारी मदद करते हैं । वेद मनुष्य को सत्य, प्रेम, अहिंसा, सेवा, संयम, त्याग, तपस्या और विश्व बंधुत्व जैसे गुणों को अपनाने के लिए प्रेरित करते हैं । वेद नैतिकता और सही सामाजिक आचरण के मुद्दों पर हमसे संजीदा बात करते हैं ।
कुलदीप चंद अग्निहोत्री ने कहा कि हमें हर हाल में हिंदी को प्राथमिकता देनी चाहिए। साहित्यकारों को एक दूसरे की विचारधारा का सम्मान करते हुए समाज के कल्याण और प्रसन्नता के लिए लेखन करना चाहिए। हमें हिंदी को प्राथमिकता देने के लिए इसे अपनी जिंदगी में शामिल करना होगा और हिंदी में बात करना, हिंदी साहित्य पढ़ना और हिंदी सीखने के लिए प्रेरित होना होगा। हमें हिंदी को अपनी दैनिक गतिविधियों में शामिल करना होगा और हिंदी में सोचना, हिंदी में बात करना और हिंदी में पढ़ना और लिखना शुरू करना होगा।
प्रोफेसर (डॉ.) सारस्वत मोहन ‘मनीषी’ ने कहा कि आज का समाज हर प्रकार से अशांत है, विश्व-युद्ध के बादल मंडरा रहे है और व्यक्ति स्वार्थ केंद्रित हो चला है। किसी को भी दूसरे की चिंता और फ़िक्र नहीं है। आज का मनुष्य आत्म-मुग्धता का शिकार है और उसे अपने अलावा कुछ नहीं दिखता है। इन सारी विसंगतियों का एकमात्र समाधान साहित्य की गंगोत्री से ही निकलेगा | साहित्य में समाज और सभ्यताओं को बदलने की अद्भुत ताकत है। इस संक्रमण काल में परिवर्तन की पदचाप स्पष्ट सुनाई दे रही है | इस आधार पर सारे प्रश्नों का एक ही उत्तर है। प्रथम चिंतन सत्र की मुख्य वक्ता डॉ. मंजुलता कहा कि केंद्रीय विषय ‘आत्मबोध से विश्वबोध’ का सूत्र भारतीय ज्ञान परंपरा का सार है, व्यक्ति की चेतना से समाज की चेतना तक, राष्ट्र की चेतना से विश्व की चेतना तक । इसलिए ‘आत्मबोध से विश्वबोध तक’ केवल भारतीय संस्कृति का कोई पारंपरिक सूत्र नहीं है, बल्कि आज के युग में मानवता की नैतिक और रचनात्मक पुनर्संरचना की आधारशिला है ।
यह न केवल भारत के लिए, बल्कि समूची विश्व सभ्यता के लिए एक प्रासंगिक और जीवनदायी संदेश है। डॉ. अनुपम अरोड़ा ने कहा कि इस अधिवेशन में भारतीय साहित्य और भारतीय भाषाओं की उन्नति पर भरपूर बल दिया गया। भारतीय साहित्य व भाषाओं के अनुसंधान कार्य को प्रोत्साहित किया गया। भारतीय भाषाओं में परस्पर आदान-प्रदान और सहयोग पर बढ़ावा दिया। भारतीय जीवन मूल्यों में आस्था रखने वाले साहित्यकारों को प्रोत्साहित तथा अच्छे साहित्य के प्रकाशन और प्रसारण में सहयोग बारे जोर डाला गया। जिला प्रधान प्रदीप शर्मा ने कॉलेज प्राचार्य डॉ. अनुपम अरोड़ा के साथ मेहमानों का स्वागत किया। मंच संचालन डॉ संतोष ‘तृप्ता’ ने किया।