पानीपत। एक व्यक्ति की हार्टअटैक से मौत होने के बाद एलआईसी ने पुरानी बीमारी बताकर क्लेम खारिज कर दिया। आयोग ने इसे कंपनी की सेवा में कमी माना। जिला उपभोक्ता आयोग ने स्पष्ट कहा कि बीमा करते समय मेडिकल जांच कराना कंपनी की जिम्मेदारी होती है। आयोग ने कंपनी को मृतक के आश्रित को क्लेम के 10 लाख रुपये नौ प्रतिशत ब्याज के साथ देने के आदेश दिए। साथ ही 11 हजार रुपये का जुर्माना भी लगाया है।
जिले के एक गांव निवासी विक्रम ने आयोग में शिकायत दी थी कि उनके पिता बिजेंद्र ने 28 जनवरी 2019 को 10 लाख रुपये की बीमा पॉलिसी ली थी, जिसमें उसे नामित (नॉमिनी) बनाया था। 3 मई 2022 को उनके पिता की हार्टअटैक से मृत्यु हो गई। इसके बाद उन्होंने कंपनी से क्लेम अदा करने के लिए आवेदन किया लेकिन, कंपनी ने क्लेम का दावा खारिज कर दिया। एलआईसी की ओर से कहा गया कि पॉलिसीधारक ने पॉलिसी के समय अपनी स्वास्थ्य स्थिति के बारे में सही जानकारी नहीं दी। कंपनी के अनुसार व्यक्ति पहले से हृदय रोग से ग्रस्त थे, जिसे प्रस्तावपत्र में छिपाया गया। इस आधार पर दावा अस्वीकार किया गया।
आयोग ने मामले की सुनवाई के दौरान पाया कि बीमा कंपनी यह साबित नहीं कर सकी कि कथित पुरानी बीमारी ही मृत्यु का कारण बनी। रिकॉर्ड के अनुसार मृत्यु अचानक हार्टअटैक से हुई। आयोग ने कहा कि केवल अनुमान या पड़ोसियों के बयान के आधार पर बीमारी मान लेना पर्याप्त नहीं है। जब तक बीमारी और मृत्यु के बीच स्पष्ट संबंध साबित न हो, क्लेम खारिज नहीं किया जा सकता।
आयोग ने यह भी कहा कि पॉलिसी जारी करते समय बीमा कंपनी की जिम्मेदारी होती है कि वह आवश्यक मेडिकल जांच कराए। यदि कंपनी ने उस समय जांच नहीं कराई, तो बाद में बीमारी छिपाने का आरोप लगाकर क्लेम खारिज करना सही नहीं है। आयोग ने कंपनी को 10 लाख रुपये नौ प्रतिशत ब्याज के साथ अदा करने के आदेश दिए। साथ ही 11 हजार रुपये मानसिक क्षतिपूर्ति और 5500 रुपये मुकदमे में हुए खर्च के तौर पर देने के आदेश दिए हैं।
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