- पूठर गांव के हवलदार विजय सिंह 12 जून 1999 को हुए थे बलिदान, पत्नी बिमला देवी ने कहा-उन्हें गर्व है
कुलदीप सिंह आर्य
इसराना। मेरे पति विजय सिंह 4-जाट रेजिमेंट में हवलदार के पद पर थे। वे जब भी आते थे तो सेना के किस्से सुनाते थे। कारगिल की लड़ाई शुरू हुई तो विजय सिंह पिथौरागढ़ में थे। उनकी कंपनी को कारगिल में जाने का बुलावा आया। वे तब एक रात घर आए थे मगर कुछ घंटे के लिए रुके थे। उन्होंने मुझसे कहा था कि अब जंग शुरू हो चुकी है शायद वे वापस नहीं आ पाएं, आपको परिवार का अच्छे से ख्याल रखना होगा। तब उन्हें यह मालूम नहीं था कि यह पति से उनकी आखिरी मुलाकात होगी।
यह कहना है पूठर गांव के कारगिल के बलिदानी हवलदार विजय सिंह की पत्नी बिमला का। उन्होंने बताया कि उनके पति ने जंग शुरू होने से दो सप्ताह पूर्व चिट्ठी लिखी थी। वे कारगिल के काकसर क्षेत्र में तैनात थे। उन्होंने कहा था कि जंग के हालात बन रहे हैं। उनको अब बॉर्डर पर जाना होगा। छुट्टी मिलना मुश्किल है। वे आज भी उनके कहे आखिरी शब्द नहीं भूली हैं। 12 जून 1999 को गोली लगने से वह बलिदान हो गए थे। उनको फोन पर इसकी सूचना मिली। यह सुनते ही उनकी दुनिया उजड़ गई थी। वह खुद को संभाल नहीं पा रही थी। उन्होंने बड़ी मुश्किल से खुद को संभाला। उन्हें गर्व है कि उनका सुहाग देश के लिए बलिदान हुआ है।
बलिदानी विजय सिंह का जन्म पूठर गांव में किसान रघबीर सिंह के घर 11 दिसंबर 1959 को हुआ था। वे 27 अक्टूबर 1979 को बरेली में 4-जाट रेजिमेंट में भर्ती हुए। वह कारगिल के काकसर में जंग के समय 12 जून 1999 को बलिदान हो गए। सरकार की तरफ से उसकी पत्नी को इसराना में गैस एजेंसी व छोटे भाई हरिपाल को सरकारी नौकरी मिली। गांव के स्कूल का नाम बलिदानी विजय सिंह के नाम हुआ व गांव पूठर में बलिदानी विजय सिंह का स्मारक बनाया गया है।