मैं शादी के बाद लगातार नजदीकी मंदिर में सेवा के लिए जाती हूं। लगातार सेवा करते हुए अचानक मेरे मन में कान्हा लेने का विचार आया। जब मैंने अपने पति को इस बारे में बताया कि क्यों न हम भी कान्हा रखें और उनकी अपने बच्चों के समान देखभाल करें। उन्होंने मेरी बात को समझा और हम 12 साल पहले वृंदावन से बाल स्वरूप लड्डू गोपाल लेकर आए। तब से मैं, मेरा पति और मेरे बच्चे लड्डू गोपाल की देखभाल कर रहे हैं। आज वह भी हमारे परिवार का अहम हिस्सा बन गए हैं।
मैं लड्डू गोपाल का जन्मदिन अपने बच्चों की तरह मना रही हूं। उनके जन्मदिन पर नई ड्रेस, केक, टॉफी, कान्हा का पसंदीदा माखन, फल, मिठाई और पकवान बनाकर भोग लगाती हूं। इसी प्रकार जन्माष्टमी पर लड्डू गोपाल के लिए अलग-अलग तरह के पकवान बनाती हूं। उन्हें नई ड्रेस पहनाकर तैयार करती हूं। माखन का भोग लगाती हूं। जब भी मैं परेशान होती हूं तो उनके सामने अपने मन की सारी परेशानी रख देती हूं और उनके आशीर्वाद से जल्द वह परेशानी दूर हो जाती है। लड्डू गोपाल के बिना परिवार अधूरा सा लगता है। मैं उन्हें ज्यादातर मंदिर में रखती हूं। यदि एक या दो रात कहीं बाहर रहना होता है तो मैं उन्हें भी अपने साथ ले जाती हूं। लड्डू गोपाल मेरे बेटे की तरह हर पल मेरा साथ देते हैं।
प्रस्तुति : अनीता रानी, सेक्टर-18