फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

कारगिल विजय दिवस: देश के लिए दी जान, दिलों पर करते हैं राज

विज्ञापन
बापौली। शहीद रियासत अली की पत्नी हाथ में उनका फोटो लेकर जानकारी देते हुए। - फोटो : Panipat
विज्ञापन
बापौली। कारगिल युद्ध के 22 साल बाद भी लोगों के दिलों में कारगिल शहीद आज भी राज करते हैं। केवल शहीदों के परिजन ही नहीं क्षेत्र की जनता के मन में भी उनके लिए प्रेम हैं। बापौली व सनौली ब्लॉक से तीन सैनिक कारगिल के युद्ध में शहीद हुए थे। इनमें गांव सनौली खुर्द से ऋषिपाल त्यागी, गांव अधमी से रियासत अली और गांव अतौलापुर से सुशील हैं। इन्होंने दुश्मन का मुकाबला करते हुए अपने प्राण न्यौछावर कर दिए।
विज्ञापन

गांव सनौली खुर्द के शहीद ऋषिपाल त्यागी के भाई महेंद्र ने बताया कि उन्हें भाई पर गर्व है। हालांकि उन्होंने भी सेना में सेवाएं दीं है, लेकिन सरकार से नाराजगी जाहिर की। उन्होंने कहा कि हरियाणा सरकार की तरफ से परिवार के एक सदस्य को नौकरी दी गई थी लेकिन केंद्र सरकार ने अपनी घोषणा के अनुसार पेट्रोल पंप नहीं दिया। गांव में प्रतिमा नहीं बनवाई गई। हमने अपने पैसों से अपनी ही जमीन पर शहीद ऋषिपाल की प्रतिमा बनवाकर स्थापित की है। महेंद्र त्यागी ने एक शिकायत जिला प्रशासन से भी है कि उनके भाई शहीद ऋषिपाल की प्रतिमा के दोनों तरफ बड़े-बड़े बोर्ड लगा दिए गए हैं। वह बोर्ड को हटवाने के लिए एसडीएम समालखा से मिल भी चुके हैं पर आज तक बोर्ड नहीं हट पाए।
गांव अतौलापुर वासी शहीद सुशील कुमार के बड़े भाई जगदीश कुमार ने बताया कि उनके भाई जाट रेजीमेंट में थे, जो 30 अगस्त 1999 को कारगिल में पाकिस्तान के साथ लड़ाई में शहीद हो गए। इनका गांव में राजकीय सम्मान के साथ अंमित संस्कार किया गया था। सरकार ने शहीद सुशील को सम्मान देते हुए समालखा में एक पेट्रोल पंप अलाट किया है। इसे शहीद की पत्नी चला रही है। पेंशन भी सरकार की तरफ से आ रही है। यही नहीं शहीद की एक प्रतिमा भी गांव में सरकार की तरफ से बनवाई गई है।
विज्ञापन

गांव अधमी में जब शहीद रियासत अली के घर पर उनकी पत्नी शकीला से बात हुई तो उन्होंने बताया कि उनके पति देश की रक्षा करते हुए 3 जुलाई 1999 को कारगिल में शहीद हुए थे। उन्हें और बच्चों को उनकी कमी खलती है लेकिन गर्व भी है कि देश की रक्षा करते हुए उन्होंने प्राण न्यौछावर किए। बताया कि सरकार से उन्हें कोई गिला शिकवा नहीं है। बस एक बच्चे की नौकरी लगवाना ही उनकी मांग है। शकीला को सरकार ने एक पेट्रोल पंप दिया है। इसके अलावा शहीद पेंशन भी मिल रही है। गांव में उनके नाम पर लाइब्रेरी है। हालांकि उसमें पुस्तकें बहुत ही कम है।
विज्ञापन
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें