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35 फीसद शटल लैस इकाइयां में रूका काम

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पानीपत की हैंडलूम मार्केट अब तक के सबसे मंदे दौर में चल रही है। इसका बड़ा कारण देश में चल रही आर्थिक मंदी है। अंतराष्ट्रीय मार्केट में उत्पादों की मांग कमजोर पड़ गई है। इसी कारण मिलों में उत्पादन कम करना पड़ रहा है। शहर की 35 फीसद शटल लेस इकाइयां नहीं चल रही। दोनों शिफ्ट में चलने वाली शटल लेस मुश्किल के दौर में गुजर रही हैं। एक शिफ्ट मे भी उद्यमी शटल लेस नहीं चला पा रहे हैं। कईं वर्षों के बाद यह स्थिति देखने को मिली है। अगस्त व सितंबर माह में सीजन पीक पर होता है। इस बार पीक सीजन भी मंदा गुजर रहा है। बाजार में वित्तीय संकट भी बना हुआ है। अब अक्तुबर माह व नवंबर में हैंडलूम उत्पादों की मांग बढ़ने की उम्मीद है। नवंबर माह में शादियों का सीजन शुरू होगा। उस पर ही उद्यमी उम्मीद लगाए बैठे हैं। पावरलूम का स्थान शटल लेस ने ले लिया था। पावरलूम की तुलना में शटललेस पर उत्पादन कई गुणा अधिक होता है। शटल लेस पर कपड़ा, फैब्रिक्स बनता है, जिससे बेडशीट, कर्टन क्लाथ, टैपस्टेरी आदि बनाए जाते हैं। पीवी, पीसी, प्योर काटन की मांग भी कमजोर है। यार्न बाजार में भी मांग काफी कमजोर चल रही है। यार्न मिलों में भी उत्पादन कमजोर चल रहा है।
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जून से बिगड़े हालात अब तक काबू नहीं आए
शटल लेस पर बने कपड़े की मांग जून माह से ही कमजोर हैं। जुलाई में भी डिमांड नहीं आई। अगस्त में एक दुक्का ही डिमांड पर कारोबारियों ने काम किया है। उद्यमियों का कहना है कि इस बार मंदी ने बाजार की कमर तोड़ दी है। निर्यात में मांग कमजोर होने पर घरेलू मार्केट से काम चल जाता था, इस बार घरेलू मार्केट में भी मांग नहीं निकल पा रही है।
एनजीटी की सख्ती का असर
हरियाणा चैंबर ऑफ कॉमर्स के चेयरमैन विनोद खंडेलवाल का कहना है कि एनजीटी की सख्ती का असर भी है। कुछ उद्योग बंद पड़े हैं। डाइंग के रेट भी बढ़ गए हैं। कपड़े की उत्पादन लागत बढ़ती जा रही है। मांग कमजोर है। कमजोर मांग होने के कारण कपड़े के दाम नहीं बढ़ पा रहे। इस कारण उत्पादन कम करने में उद्यमी बेहतरी समझ रहे हैं। कॉटन व पॉलिस्टर यार्न की मांग भी काफी कमजोर चल रही है।
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एनजीटी की मार के कारण डाइंग के रेट बढ़े हैं : राणा
एनजीटी की कार्रवाई से कई डाइंग यूनिट बंद हो गई है। इस कारण कपड़े की उत्पादन लागत बढ़ती जा रही है और डाइंग के रेट भी बढ़ गए हैं। अगर पानीपत के सभी डाइंग यूनिट बंद हो गई तो उद्यमियों को डाइंग के लिए लुधियाना, उत्तर प्रदेश या उत्तराखंड जाना पड़ेगा। इससे कपड़ा और अधिक महंगा होगा।
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