इसराना। ब्रज की होली, कुल्लू का दशहरा व नौल्था का फाग जिसने नहीं देखा, उसने जिंदगी में कुछ नहीं देखा। नौल्था में 992 वर्ष पुरानी फाग उत्सव की परंपरा को इस साल भी नजर आई। गांव में वीरवार रात को सूखी डाट लगने के साथ ही महोत्सव का शुभारंभ हो गया है।
उल्लेखनीय है कि डाहर गांव में सूखी और रंगों की डाट लगाई जाती है। नौल्था के ऐतिहासिक फाग मनाने की परंपरा पिछले कई सालों से सिमटी जरूर है, लेकिन अब की बार गांव की पंचायत व युवाओं के सहयोग से फाग उत्सव मनाने के लिए उत्साह देखा जा रहा है। ग्रामीणों का प्रयास है वर्षों से चली आ रही परंपरा को कायम रखा जाए।
फाग उत्सव की परंपरा व इतिहास
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सांग का भी किया जाता है आयोजन
ग्रामीण जसमेर नौल्था बताते हैं कि नौल्था में फाग उत्सव मनाने के लिए तैयारियां शुरू हो चुकी है। परंपरा के अनुसार गांव में सुखी डाट लगनी शुरू हो चुकी है। गांव में फाग उत्सव का शुभारंभ फाग से सप्ताह पूर्व गांव की चौपालों के पास सुखी डाट लगाने से होता था। गांव में किसी प्रसिद्व सांगी का सांग भी बुलाया जाता था। जो एतिहासिक, धार्मिक व देशभक्ति पर आधारित किस्सों का मंचन कर लोगो का मनोरंजन करते थे। इसके लिए भी प्रयास किया जा रहा है।
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परंपरा कायम रहनी चाहिए
ग्रामीण ओमप्रकाश चौहान ने बताया कि फाग के दिन बाबा लाठेवाले व देवी देवताओं की झांकियां निकाल कर गांव की सभी चौपालों पर कढायों में रंग पकाया जाता है। इससे कई दिन पहले सूखी डाट लगाई जाती है। फाग के दिन रंगों की डाट लगाई जाती है। वह चाहते है कि वर्षों से चली आ रही परंपरा कायम रही।
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उत्सव मनाने के बाद किया बेटे का दाह संस्कार
ग्रामीण जितेंद्र जागलान ने बताया कि एक समय था कि जब गांव के घुम्मन जैलदार के बेटे सरदारा की फाग के दिन मौत हो गई। पूरे गांव में मातम छा गया था। फाग उत्सव को रोक दिया गया था। वर्षों से चली आ रही परंपरा न टूटे, इसके लिए घुम्मन जैलदार ने कहा कि फाग उत्सव जरूर मनेगा। बाद में बेटे का दाह संस्कार किया जाएगा। घुम्मन जैलदार ने रंग से पिचकारी भर बेटे की अर्थी पर मारी व फाग उत्सव शुरू हो गया। फाग उत्सव मनाने के बाद बेटे का दाह संस्कार कराया।
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ब्रिटिश सरकार तक नहीं लगा सकी है रोक
ग्रामीण तेजबीर जागलान ने बताया कि फाग से कई दिन पूर्व गांव की चौपाल की दीवार के साथ दोनों तरफ ग्रामीण खड़े होकर और दोनों हाथ ऊपर उठा कर जोर आजमाइश करते हैं। इसको सूखी डाट कहा जाता है। फाग के दिन ग्रामीण चौपाल के ऊपर रंग पकाकर कढायों में भरकर चौपाल पर रख दिया जाता है। नीचे लोग खड़े हो जाते हैं और उन पर ऊपर से रंग फेंका जाता है। इसे रंगों की डाट कहते है। फाग उत्सव को एक बार ब्रिटिश सरकार ने 1944 में रोकने के लिए आदेश दिए थे, लेकिन लोगों में पनपते रोष के चलते बाद में सीली सातम को फाग मनाने के निर्देश देने पर ग्रामीणों ने फाग उत्सव मनाया था।
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सफल आयोजन के लिए बनाई गई है कमेटी
सरपंच बलराज जागलान का कहना है कि फाग उत्सव में चली आ रही परंपराओं को पूरा करने के लिए तैयारी चल रही है। परंपरा को निभाने के लिए मिल कर काम किया जा रहा है। फाग उत्सव के सफल आयोजन के लिए युवाओं की कमेटी बनाई गई है।