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जले की 65 फीसदी गर्भवतियों में खून की कमी, प्रधानमंत्री मातृत्व सुरक्षा अभियान के तहत हुई 650 महिलाओं की जांच, 90 हाई रिस्क के द

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डिलीवरी के दौरान गर्भवती महिलाओं और शिशुओं की जान बचाने के लिए स्वास्थ्य विभाग बीते दो वर्ष से हर महीने कैंप लगा रहा है, इसके बावजूद घरों में हो रही डिलीवरी पर स्वास्थ्य विभाग लगाम नहीं लगा सका है। इतना ही नहीं बीते डेढ़ वर्ष में डिलीवरी के दौरान 29 गर्भवती महिलाओं की मौत हो चुकी है और सबसे बड़ी बात इन कैंपों के बावजूद आज भी जिले की 65 फीसदी गर्भवती महिलाओं में खून की कमी है। नतीजा प्री मैच्योर डिलीवरी की संख्या बढ़ गई है। आंकड़ों पर गौर करें तो रोज औसतन चार शिशु प्री मैच्योर पैैदा हो रहे हैं। यह आंकड़े स्वास्थ्य विभाग की कार्यशैली पर सवाल खड़े कर रहा है, जिसके लिए दो वर्ष से कैंप लगा रहे हैं, उसमे उनको सफलता नहीं मिल सकी है। ऐसे में कहीं न कहीं कमी है, नतीजा बच्चों की डिलीवरी के दौरान गर्भवती महिलाओं की मौत हो रही है और कमजोर बच्चे पैदा हो रहे हैं। शनिवार को स्वास्थ्य विभाग ने 13 स्वास्थ्य केंद्रों पर गर्भवती महिलाओं के लिए जांच शिविर लगाया। 16 डॉक्टरों ने महिलाओं की जांच की। कैंप में 650 गर्भवती महिलाओं की जांच की, जिसमें 80 महिलाएं हाई रिस्क प्रेग्नेंसी के दायरे में मिली।
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दो साल में 550 शिशुओं की मौत
स्वास्थ्य विभाग के अनुसार पानीपत में पिछले डेढ़ साल में 2310 महिलाओं की डिलीवरी घर पर हुई है। यह संख्या जिले भर में हुए प्रसव की 7.5 प्रतिशत है। पानीपत में पिछले डेढ़ साल में डिलीवरी के दौरान 29 महिलाओं की मौत हुई। इनमें से अधिकतर महिलाएं वो हैं जिन्होंने दाई से डिलीवरी कराने का प्रयास किया। जब उनकी स्थिति बिगड़ी तो उनको सिविल अस्पताल लाया गया, जहां हालत गंभीर होने पर उनकी मौत हो गई। जिले में विभिन्न कारणों से दो साल में एक से पांच वर्ष की आयु के 550 नवजातों की मौत हुई। स्वास्थ्य विभाग सरकार के निर्देशों के बाद भी आज तक दाईयों के खिलाफ केस दर्ज नहीं करवा पाया है। जबकि जिले में लगभग 150 दाई सक्रिय है।
पिछले डेढ़ साल में 29 महिलाओं की हुई मौत
2018 में जिले में कुल 28030 डिलीवरी हुई है। सरकारी अस्पताल में 15305 डिलीवरी हुई है, जबकि निजी अस्पताल में 11415 व होम डिलीवरी 1310 हुई है। सरकारी आंकड़ों के अनुसार 29 गर्भवती महिलाओं की इस दौरान मौत हुई है। 2019 में अब तक लगभग 25 हजार डिलिवरी हुई है। इनमें से लगभग 1400 डिलीवरी घर पर हुई हैं।
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इन कारणों से नहीं बंद हो रही घर में डिलीवरी
सबसे ज्यादा दाई सनौली, बापौली व यमुना से सटे गांवों में सक्रिय है। इन क्षेत्र में डॉक्टरों के अनुसार 150 दाई सक्रिय है। विभाग कई बार इनको घर पर डिलीवरी न करने की चेतावनी दे चुका है। फिर भी इन्हीं क्षेत्रों से डिलीवरी के अधिक मामले सामने आते हैं। इसका बड़ा कारण जागरूकता की कमी, शिक्षा का अभाव, स्वास्थ्य विभाग की लचर कार्रवाई, स्वास्थ्य विभाग की ग्राउंड स्तर पर पहुंच की कमी होम डिलीवरी का बड़ा कारण है।
प्री मैच्योर डिलीवरी बढ़ रही है
जिले में लगातार प्री मैच्योर डिलीवरी बढ़ रही है। सिविल अस्पताल में हर रोज 30 से 35 डिलीवरी होती है। इनमें औसतन 4-5 प्री मैच्योर डिलीवरी होती है। प्री मैच्योर डिलीवरी का बड़ा कारण महिलाओं में संक्रमण, हाईपरटेंशन और प्री एक्लेम्शिया, खून की कमी व हाई ग्रेड फीवर है।
होम डिलीवरी रोकने के लिए स्वास्थ्य विभाग प्रयासरत है। सरकारी स्वास्थ्य केंद्रों में गर्भवती महिलाओं के लिए विभिन्न प्रकार की सेवाएं भी है, लेकिन होम डिलिवरी का बड़ा कारण अशिक्षा और जागरूकता की कमी है। उनका प्रयास है कि लोगों तक सरकारी सेवाएं पहुंचे और उन्हें जागरूक किया जाए। दाईयों पर भी अंकुश लगाने के प्रयास जारी है।
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डॉ. जितेंद्र कादियान, सिविल सर्जन पानीपत।
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