पानीपत। ऐतिहासिक नगरी पानीपत दिल्ली के ताज का फैसला करने वाली रही है। वह चाहे देश में अपना साम्राज्य बढ़ाने को लेकर अफगानी शासकों का आक्रमण रहा हो या फिर अंग्रेजी हुकूमत का देश में विस्तार रहा हो। दिल्ली के सिंहासन पर बैठने से पहले शासकों को पानीपत की धरती से ही होकर गुजरना पड़ा है। इस धरती पर तीन युद्ध भी हुए। इन युद्धों को इतिहास में पानीपत की तीन लड़ाइयों के नाम से जाना जाता है। पानीपत देश ही नहीं पूरे विश्व में युद्धों की धरती के नाम से भी पहचान बनाए हुए है। आज भी इसका ऐतिहासिक और राजनीति के क्षेत्र में बहुत महत्व है।
दिल्ली के ताज का फैसला करने वाला पानीपत आज 27 साल का हो गया है। प्रदेश अपनी स्वर्ण जयंती मनाने की तैयारी में लगा है तो पानीपत अपनी सिल्वर जुबली मना रहा है। इतिहासकारों के अनुसार पानीपत पहले करनाल जिले का हिस्सा था। एक नवंबर 1989 को चौ. देवीलाल ने इसे अलग जिला घोषित किया। चौ. देवीलाल की सरकार बदलने के बाद भजनलाल सत्ता में आए। उन्होंने 1991 में पानीपत को फिर से करनाल जिले का हिस्सा बना दिया। इसके बाद पानीपत के लोगों ने अलग से जिला बनाने के लिए आंदोलन किया। राजनैतिक दबाव बढ़ने पर तत्कालीन मुख्यमंत्री भजनलाल ने 1993 में पानीपत को फिर से जिला घोषित कर दिया। हालांकि, लोकसभा क्षेत्र आज भी करनाल ही है। यह बात अलग है कि यहां के चारों विधानसभा क्षेत्र प्रदेश की राजनीति में विशेष स्थान रखते हैं। पानीपत जिले में चार विधानसभा क्षेत्र और पांच खंड हैं। यहां पर करीब 167 ग्राम पंचायतें हैं।
यह है ऐतिहासिक महत्व
पानीपत को ऐतिहासिक नगरी के नाम से पूरे विश्व में जाना जाता है। पानीपत दिल्ली से 90 किलोमीटर और चंडीगढ़ से 169 किलोमीटर की दूरी पर यमुना के तट पर स्थित है। इसके एक तरफ उत्तर प्रदेश और तीन तरफ की सीमा करनाल, जींद, सोनीपत से लगती है। यह पांडवों के पांच शहरों में से एक था। उस समय इसको पांडवप्रस्थ के नाम से भी जाना जाता था। इसका बाद में नाम पानीपत रख दिया गया। यहां पर बू अली कलंदर शाह की दरगाह का धार्मिक महत्व है। मशहूर शायर अल्ताफ हुसैन हाली की गजलों की धुन आज भी विश्व की ऐतिहासिक धरोहरों में शामिल है। पानीपत का ऐतिहासिक प्राचीन सिद्ध श्री देवी मंदिर भी बहुत महत्व रखता है। यमुना नदी के किनारे पर स्थित होने के चलते उपजाऊ धरती की वजह से भी यह विदेशी आक्रमणकारियों के निशाने पर रहा।
यह है राजनीति महत्व
दिल्ली के सिंहासन पर बैठने वाले राजाओं या आक्रमणकारियों को पानीपत से होकर ही जाना पड़ता था। यहां पर 1526 में पहली, 1556 में दूसरी और 1761 में तीसरी बड़ी लड़ाई हुई। इन युद्धों को इतिहास में पानीपत की लड़ाइयों के नाम से जाना जाता है। बताया जाता है कि 1857 की क्रांति का मुख्य केंद्र भी पानीपत बन गया था। यहां पर जींद और पटियाला की रियासतों का दमन कर दिया था। इसके चलते अंग्रेजों ने पानीपत का जिला खत्म कर दिया। महात्मा गांधी आजादी की लड़ाई के दौरान दो बार पानीपत आए। उन्होंने किला पार्क पर पहली बार बैठक की थी।
पानीपत के इतिहास की यादें
पानीपत में हिंदी रक्षा समिति के आंदोलन के दौरान 1966 को पुलिस फायरिंग के दौरान एक लड़के की मौत हो गई थी। 15 मार्च 1966 को कुछ दुकानदार एक दुकान में इस विषय को लेकर बैठक कर रहे थे। इस दुकान में आग लगाकर तीन लोगों को जिंदा जला दिया गया था। 1857 की क्रांति में हरियाणा में दो केंद्र बनाए गए थे। इनमें पानीपत एक था। यहां पर 30 मई से पहले ही विद्रोह शुरू हो गया था।
उद्योग और एक्सपोर्ट के नाम से पहचान
वरिष्ठ नागरिक प्रेमचंद गुप्ता निवासी शांति नगर से अमर उजाला ने बात की और उनसे पानीपत के ऐतिहासिक के साथ ही राजनीतिक महत्व के बारे में जाना। प्रेमचंद गुप्ता ने बताया कि पानीपत की पहचान राजनीति से ज्यादा उद्योग और एक्सपोर्ट के क्षेत्र में है। पानीपत को अलग से लोकसभा क्षेत्र नहीं बनाया जा सका है। यह आज भी करनाल लोकसभा क्षेत्र के अंतर्गत आता है। यहां पर पहले विधायक 1951-52 में किशन गोपाल दत्त बने। वे लगातार दूसरी बार विधायक बने। इसके बाद उप चुनाव में डॉ. परमानंद वफिर 1962 में फतेहचंद विज विधायक बने। वे हरियाणा गठन के बाद लगातार दो बाद विधायक रहे। इसके बाद 1972 में हुकुमत शाह विधायक बने। फतेहचंद विज इसके बाद 1977 और 1982 में फिर से विधायक बने। 1987 और 1991 में हुकुमत शाह के सुपुत्र बलबीर पाल शाह विधायक बने। वर्ष 1996 में बंसीलाल की सरकार में ओमप्रकाश जैन और इसके बाद 2009 तक बलबीर पाल शाह विधायक रहे। रोहिता रेवड़ी ने 2014 में शहरी विधानसभा क्षेत्र से विधायक चुनी गई।
सरकार के हिस्सा बने, पर प्रभावी नहीं रहे
समान नागरिक संहिता अभियान के संयोजक नेमचंद जैन ने बताया कि पानीपत की विधानसभा सीटों की संख्या तीन से चार तो हो गईं, लेकिन प्रदेश की सत्ता में कभी दमदार स्थान नहीं पा सकी। हालांकि, आज चारों विधानसभा सीटें भाजपा की झोली में हैं। जिले के इसराना विधानसभा से विधायक कृष्णलाल पंवार को परिवहन, आवास एवं जेल विभाग मिला हुआ है। इससे पहले ओमप्रकाश जैन भूपेंद्र सिंह हुड्डा की सरकार में परिवहन मंत्री रहे हैं। बलबीर पाल शाह 1987 में कुछ दिनों तक कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष रहे। उन्हें भजनलाल की 1991 की सरकार में परिवहन राज्यमंत्री बनाया गया। करनाल लोकसभा क्षेत्र में पानीपत का कोई भी धरतीपुत्र 1971 के बाद सांसद नहीं बना।